सोमवार, 4 सितंबर 2017

सूर्यवंशी ''मौर्य'' क्षत्रिय राजपूत वंश की गौरव गाथा


मौर्यो के रघुवंशी क्षत्रिय होने के प्रमाण-
महात्मा बुध का वंश शाक्य गौतम वंश था जो सूर्यवंशी क्षत्रिय थे।कौशल नरेश प्रसेनजित के पुत्र विभग्ग ने शाक्य क्षत्रियो पर हमला किया उसके
बाद इनकी एक शाखा पिप्लिवन में जाकर रहने लगी। वहां मोर पक्षी की अधिकता के कारण मोरिय कहलाने लगी।
बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’(नंदवंश) के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है।
चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है।
एक और कहानी भी है जिसमें मोरिय नगर नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। इस शहर का नाम मोरिय नगर इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं। जिन शाक्य गौतम क्षत्रियों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे मोरिय कहलाए।
महाबोधिवंस में कहा गया है कि ‘कुमार’ चंद्रगुप्त, जिसका जन्म राजाओं के कुल में हुआ था (नरिंद-कुलसंभव), जो मोरिय नगर का निवासी था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था, चाणक्य नामक ब्राह्मण (द्विज) की सहायता से पाटलिपुत्र का राजा बना।
महाबोधिवंस में यह भी कहा गया है कि ‘चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में’ हुआ था (मोरियनं खत्तियनं वंसे जातं)। बौद्धों के दीघ निकाय नामक ग्रन्थ में पिप्पलिवन में रहने वाले मोरिय नामक एक क्षत्रिय वंश का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान में बिन्दुसार (चंद्रगुप्त के पुत्र) के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को क्षत्रिय कहा गया है।
मौर्यो के 1000 हजार साल बाद विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस ग्रन्थ लिखा।जिसमे चन्द्रगुप्त को वृषल लिखा।
वर्षल का अर्थ आज तक कोई सही सही नही बता पाया पर हो सकता है जो अभिजात्य न हो।
चन्द्रगुप्त क्षत्रिय था पर अभिजात्य नही था एक छोटे से गांव के मुखिया का पुत्र था।
अब इस ग्रन्थ को लिखने के भी 700 साल बाद यानि अब से सिर्फ 300 साल पहले किसी ढुंढिराज ने इस पर एक टीका लिखी जिसमे मनगढंत कहानी लिखकर उसे शूद्र बना दिया।
यही से यह गफलत फैली।
जबकि हजारो साल पुराने भविष्य पुराण में लिखा है कि मौर्यो ने विष्णुगुप्त ब्राह्मण की मदद से नन्दवंशी शूद्रो का शासन समाप्त कर पुन क्षत्रियो की प्रतिष्ठा स्थापित की।
दो हजार साल पुराने बौद्ध और जैन ग्रन्थ और पुराण जो पण्डो ने लिखे उन सबमे मौर्यो को क्षत्रिय लिखा है।
1300 साल पुराने जैन ग्रन्थ कुमारपाल प्रबन्ध में चित्रांगद मौर्य को रघुवंशी क्षत्रिय लिखा है।
महापरिनिव्वानसुत में लिखा है कि महात्मा बुद्ध के देहावसान के समय सबसे बाद मे पिप्पलिवन के मौर्य आए ,उन्होंने भी खुद को शाक्य वंशी गौतम क्षत्रिय बताकर बुद्ध के शरीर के अवशेष मांगे,
एक पुराण के अनुसार इच्छवाकु वंशी मान्धाता के अनुज मांधात्री से मौर्य वंश की उतपत्ति हुई है।
इतने प्रमाण होने और आज भी राजपूतो में मौर्य वंश का प्रचलन होने के बावजूद सिर्फ 200-300 साल पुराने ग्रन्थ के आधार पर कुछ मूर्ख मौर्यो को शूद्र घोषित कर देते हैं।
ये वो मूर्ख हैं जिन्हें सही इतिहास की जानकारी नही है और ये पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुराई मुराव शूद्रों को (जो पिछले 50 सालो से अब मौर्य लिखने लगे)ही असली मौर्य कुशवाहा शाक्य समझ लेते हैं।
सबने मौखिक सुनकर रट लिया कि पुराणों में मौर्यो को शूद्र लिखा है पर किस पुराण में और किस पृष्ठ पर ये नही देखा।
हर ऑथेंटिक पुराण में मौर्य को क्षत्रिय सत्ता दोबारा स्थापित करने वाला वंश लिखा है
वायु पुराण विष्णु पुराण भागवत पुराण मत्स्य पुराण सबमें मौर्य वंश को सूर्यवँशी क्षत्रिय लिखा है।।
मत्स्य पुराण के अध्याय 272 में यह कहा गया है की दस मौर्य भारत पर शासन करेंगे और जिनकी जगह शुंगों द्वारा ली जाएगी और शतधन्व इन दस में से पहला मौरिया(मौर्य) होगा।
विष्णु पुराण की पुस्तक चार, अध्याय 4 में यह कहा गया है की "सूर्य वंश में मरू नाम का एक राजा था जो अपनी योग साधना की शक्ति से अभी तक हिमालय में एक कलाप नाम के गाँव में रह रहा होगा" और जो "भविष्य में क्षत्रिय जाती की सूर्य वंश में पुनर्स्थापना करने वाला होगा" मतलब कई हजारो वर्ष बाद।
इसी पुराण के एक दुसरे भाग पुस्तक चार, अध्याय 24 में यह कहा गया है की "नन्द वंश की समाप्ति के बाद मौर्यो का पृथ्वी पर अधिकार होगा, क्योंकि कौटिल्य राजगद्दी पर चन्द्रगुप्त को बैठाएगा।"
कर्नल टॉड मोरया या मौर्या को मोरी का विकृत रूप मानते थे जो वर्तमान में एक राजपूत वंश का नाम है।
महावंश पर लिखी गई एक टीका के अनुसार मोरी नगर के क्षत्रिय राजकुमारों को मौर्या कहा गया।
संस्कृत के विद्वान् वाचस्पति के कलाप गाँव को हिमालय के उत्तर में होना मानते हैं-मतलब तिब्बत में। ये ही बात भागवत के अध्याय 12 में भी कही गई है. "वायु पुराण यह कहते हुए प्रतीत होता है की वो(मारू) आने वाले उन्नीसवें युग में क्षत्रियो की पुनर्स्थापना करेगा।"
(खण्ड 3, पृष्ठ 325) विष्णु पुराण की पुस्तक तीन के अध्याय छः में एक कूथुमि नाम के ऋषि का वर्णन है।
गुहिल वंश के बाप्पा रावल के मामा चित्तौड़ के राजा मान मौर्य थे।
चित्तौड की स्थापना चित्रांगद मौर्य ने की थी।
कुमारपाल प्रबन्ध में 36 क्षत्रिय वंशो की सूची में मौर्य वंश का भी नाम है
गुजरात के जैन कवि ने चित्रांगद मौर्य को रघुवंशी लिखा था 7 वी सदी में।।
मौर्यो ने पुरे भारत और मध्य एशिया तक पर राज किया।दूसरे वंशो के राज्य उनके सामने बहुत छोटे हैं
कोई 100 गांव की स्टेट कोई 500 गांव की स्टेट वो सब मशहूर हो गए।
और कई लाखो गांव कस्बो देशों के मौर्य सम्राट जो सीधे राम के वंशज हैं उन्हें बिना ढंग से अध्यनन करके शूद्र बताया जाए तो बड़े शर्म की बात है।।

चन्द्रगुप्त मौर्य का जीवन-----
चन्द्रगुप्त मोरिय के पिता
पिप्लिवंन के सरदार थे जो मगध के शूद्र राजा नन्द के हमले में मारे गये।
ब्राह्मण चाणक्य का नन्द राजा ने अपमान किया जिसके बाद चाणक्य ने देश को शूद्र राजा के चंगुल से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया। एक दिन
चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को देखा तो उसके भीतर छिपी प्रतिभा को पहचान
गया। उसने च्न्द्र्गुप्र के वंश का पता कर उसकी माँ से शिक्षा देने के लिए
चन्द्रगुप्त को अपने साथ लिया। फिर वो उसे तक्षिला ले गया जहाँ
चन्द्रगुप्त को शिक्षा दी गयी।
उसी समय यूनानी राजा सिकन्दर ने भारत
पर हमला किया।
चन्द्रगुप्त और चानक्य ने पर्वतीय राजा पर्वतक से मिलकर नन्द राजा पर
हमला कर उसे मारकर देश को शूद्रो के चंगुल से मुक्ति दिलाई। साथ ही साथ
यूनानी सेना को भी मार भगाया। उसके बाद बिन्दुसार और अशोक राजा
हुए। सम्राट अशोक बौध बन गया।
जिसके कारण द्वेषवश ब्राह्मणों ने उसे शूद्र घोषित कर
दिया।
अशोक के कई पुत्र हुए जिनमे महेंद्र कुनाल,जालोंक दशरथ थे
जलोक को कश्मीर मिला,दशरथ को मगध की गद्दी मिली।
कुणाल के पुत्र सम्प्रति को
पश्चिमी और मध्य भारत यानि आज का गुजरात राजस्थान मध्य प्रदेश
आदि मिला।
सम्प्रति जैन बन गया उसके बनाये मन्दिर आज भी राजस्थान में मिलते हैं, सम्प्रति के के वंशज आज के मेवाड़ उज्जैन इलाके में राज करते रहे।
पश्चिम भारत के मौर्य क्षत्रिय राजपूत माने गये। चित्तौड पर इनके राजाओ के नाम महेश्वर भीम
भोज धवल और मान थे।
मौर्य और राजस्थान--------
राजस्थान के कुछ भाग मौर्यों के अधीन या प्रभाव
क्षत्र में थे। अशोक का बैराठ का शिलालेख
तथा उसके उत्तराधिकारी कुणाल के पुत्र
सम्प्रति द्वारा बनवाये गये मन्दिर मौर्यां के
प्रभाव की पुश्टि करते हैं। कुमारपाल प्रबन्ध
तथा अन्य जैन ग्रंथां से अनुमानित है कि चित्तौड़
का किला व चित्रांग तालाब मौर्य राजा चित्रांग
का बनवाया हुआ है। चित्तौड़ से कुछ दूर
मानसरोवर नामक तालाब पर राज मान का,
जो मौर्यवशी माना जाता है, वि. सं. 770
का शिलालेख कर्नल टॉड को मिला, जिसमें
माहेश्वर, भीम, भोज और मान ये चार नाम
क्रमशः दिये हैं। कोटा के निकट कणसवा (कसुंआ)
के शिवालय से 795 वि. सं. का शिलालेख
मिला है, जिसमें मौर्यवंशी राजा धवल का नाम है।
इन प्रमाणां से मौर्यों का राजस्थान में अधिकार
और प्रभाव स्पष्ट हाता है।
चित्तौड़ के ही एक और मौर्य शासक धरणीवराह का भी नाम मिलता है
शेखावत गहलौत राठौड़ से पहले शेखावाटी क्षेत्र और मेवाड़ पर मौर्यो की सत्ता थी।शेखावाटी से मौर्यो ने यौधेय जोहिया राजपूतों को हटाकर जांगल देश की ओर विस्थापित कर दिया था।
पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज चौहान के सामन्तों में भीम मौर्य और सारण मौर्य मालंदराय मौर्य और मुकुन्दराय मौर्य का भी नाम आता है।
ये मौर्य सम्राट अशोक के पुत्र सम्प्रति के वंशज थे।मौर्य वंश का ऋषि गोत्र भी गौतम है।
गहलौत वंशी बाप्पा रावल के मामा चित्तौड के मान मौर्य थे, बाप्पा रावल ने मान मौर्य से चित्तौड का किला जीत
लिया और उसे अपनी राजधानी बनाया।
इसके बाद मौर्यों की एक शाखा
दक्षिण भारत चली गयी और मराठा राजपूतो में मिल गयी जिन्हें आज मोरे मराठा कहा जाता है वहां इनके कई राज्य थे। आज भी मराठो में मोरे वंश उच्च कुल माना जाता है।
खानदेश में मौर्यों का एक लेख मिला है...जो ११ वी शताब्दी का है।जिसमे उल्लेख है के ये मौर्य काठियावाड से यहाँ आये....! एपिग्रफिया इंडिका,वॉल्यूम २,पृष्ठ क्रमांक २२१....सदर लेख वाघली ग्राम,चालीसगांव तहसील से मिला है....
एक शाखा उड़ीसा चली गयी ।वहां के राजा धरणीवराह के वंशज रंक उदावाराह के प्राचीन लेख में उन्होंने सातवी सदी में चित्तौड या चित्रकूट से आना लिखा है।
कुछ मोरी या मौर्य वंशी
राजपूत आज भी आगरा मथुरा निमाड़ मालवा उज्जैन में मिलते हैं। इनका गोत्र गौतम है। बुद्ध का गौत्र भी गौतम था जो इस बात का प्रमाण है कि मौर्य
और गौतम वंश एक ही वंश की दो शाखाएँ हैं,

मौर्य और परमार वंश का सम्बन्ध-----
13 वी सदी में मेरुतुंग ने स्थिरावली की रचना की थी
जिसमे उज्जैन के सम्राट गंधर्वसेन को जो विक्रमादित्य परमार के पिता थे उन्हें मौर्य सम्राट सम्प्रति का पौत्र लिखा था।
जिन चित्तौड़ के मौर्यो को भाट ग्रंथो में मोरी लिखा है वहां मोरी को परमार की शाखा लिख दिया।जबकि परमार नाम बहुत बाद में आया।उन्ही को समकालीन विद्वान रघुवंशी मौर्य लिखते है।
उज्जैन अवन्ति मरुभूमि तक सम्प्रति का पुरे मालवा और पश्चिम भारत पर राज था जो उसके हिस्से में आया था।इसकी राजधानी उज्जैन थी।इसी उज्जैन में स्थिरावली के अनुसार सम्प्रति मौर्य के पौत्र के पुत्र विक्रमादित्य ने राज किया जिन्हें भाट ग्रंथो में परमार लिखा गया।
परमार राजपूतो की उत्पत्ति अग्नि वंश से मानी जाती है परन्तु अग्नि से किसी की उत्पत्ति नही होती है. राजस्थान के जाने माने विद्वान सुरजन सिंंह झाझड, हरनाम सिंह चौहान के अनुसार परमार राजवंश मौर्य वंश की शाखा है.इतिहासकार गौरीशंकर ओझा के अनुसार सम्राट अशोक के बाद मौर्यो की एक शाखा का मालवा पर शासन था. भविष्य पुराण मे भी इसा पुर्व मे मालवा पर परमारो के शासन का उल्लेख मिलता है.
"राजपूत शाखाओ का इतिहास " पेज # २७० पर देवी सिंंह मंडावा महत्वपूर्न सूचना देते है. लिखते है कि विक्रमादित्य के समय शको ने भारत पर हमला किया तथा विक्रमादित्य न उन्हेे भारत से बाहर खदेडा. विक्रमादित्य के वंशजो ने ई ५५० तक मालवा पर शासन किया. इन्ही की एक शाखा ने ६ वी सदी मे गढवाल चला गया और वहा परमार वंश की स्थापना की.
अब सवाल उठता है कि विक्रमादित्य किस वंश से थे? कर्नल जेम्स टाड के अनुसार भारत के इतिहास मे दो विक्रमादित्य आते है. पहला मौर्यवंशी विक्रमादित्य जिन्होने विक्रम संवत की सुरुआत की. दूसरा गुप्त वंश का चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य जो एक उपाधि थी..
मिस्टर मार्सेन ने "ग्राम आफ सर्वे "मे लिखा है कि शत्धनुष मौर्य के वंश मे महेन्द्रादित्य का जन्म हुआ और उसी का पुत्र विक्रमादित्य हुआ..
कर्नल जेम्स टाड पेज # ५४ पर लिखते है कि मौर्य तक्षक वंशी थे जो बाद मे परमार राजपूत कहलाये. अत: स्पष्ट हो जाता है कि परमार वंश मौर्य वंश की ही शाखा है.
कालीदास , अमरिसंह , वराहमिहिर,धनवंतरी, वररुिच , शकु आदि नवरत्न विक्रमाद्वित्य के दरबार को सुशोभित करते थे तथा इसी राजवंश मे जगत प्रिसद्ध राजा भोज का जन्म हुआ.
इसी आधार पर मौर्य और परमार को एक मानने के प्रमाण हैं।
अधिकतर पश्चिम भारत के मौर्य परमार कहलाने लगे और छोटी सी शाखा बाद तक मोरी मौर्य राजपूत कहलाई जाती रही और भाट इन्हें परमार की शाखा कहने लगे जबकि वास्तव में उल्टा हो सकता है।
कर्नल जेम्स टॉड ने भी चन्द्रगुप्त मौर्य को
परमार वंश से लिखा है।
चन्द्रगुप्त के समय के सभी जैन और बौध धर्म मौर्यों को शुद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय प्रमाणित करते है ।चित्तौड के मौर्य राजपूतो को पांचवी सदी में
सूर्यवंशी ही माना जाता था किन्तु कुछ ब्राह्मणों ने द्वेषवष बौध धर्म ग्रहण करने के कारण इन्हें शूद्र घोषित कर दिया, किन्तु पश्चिम भारत के मौर्य पुन वैदिक
धर्म में वापस आ जाने से क्षत्रिय राजपूत ही कहलाये।।
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मौर्य वंश आज राजपूतो में कहाँ गायब हो गया??????
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मौर्य वंश अशोक के पोत्रो के समय दो भागो में बंट गया।
पश्चिमी भाग सम्प्रति मौर्य के हिस्से में आया।वो जैन बन गया था।उसकी राजधानी उज्जैन थी।उसके वंशजो ने लम्बे समय तक मालवा और राजस्थान में राज किया।
पूर्वी भाग के राजा बौद्ध बने रहे और पुष्यमित्र शुंग द्वारा मारे गए।वे बाद तक बौद्ध बने रहने के कारण शूद्र बन गए और पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार में मौर्य मुराव मुराई जाति शूद्र है।
पश्चिमी भारत के मौर्य बाद में आबू पर्वत पर यज्ञ द्वारा पुन वैदिक धर्म में वापस आ गए और परमार राजपूतो के नाम से प्रसिद्ध हुए।
इनकी चित्तौड़ शाखा मौर्य ही कहलाती रही।
चित्तौड़ शाखा के ही वंश भाई सिंध के भी राजा थे।उनका नाम साहसी राय मौर्य था जिन्हें मारकर चच ब्राह्मण ने सिंध पर राज किया तब उनके रिश्ते के भाई चित्तौड़ से वहां चच ब्राह्मण से लड़ने गए थे जिसका जिक्र 8 वी सदी में लिखी चचनामा में मिलता है।
जब बापा रावल ने मान मोरी को हराकर चित्तौड़ से निकाल दिया तो यहाँ के मौर्य मोरी राजपूत इधर उधर बिखर गए----
1-एक शाखा रंक उदवराह के नेतृत्व में उड़ीसा चली गयी।वहां के अधिकतर सूर्यवँशी आज उसी के वंशज होने का दावा करते हैं।
2-एक शाखा हिमाचल प्रदेश गयी और चम्बा में भरमोर रियासत की स्थापना की।इनके लेख में इन्हे 5 वी सदी के पास चित्तौड़ से आना लिखा है।ये स्टेट आज भी मौजूद है और इनके राजा को सूर्यवँशी कहा जाता है।इस शाखा के राजपूत अब चाम्बियाल राजपूत कहलाते हैं
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Chambial
3-एक शाखा मालवा की और पहले से थी और आज भी निमाड़ उज्जैन और कई जिलो में शुद्ध मौर्य राजपूत मिलते हैं।
एक शाखा आगरा के पास 24 गाँव में है और शुद्ध मोरी राजपूत कहलाती है।
इस राठौर राजपूत ठिकाने की लड़की मौर्य राजपूत ठिकाने में ब्याही है
http://www.indianrajputs.com/view/maswadia
4-एक शाखा महाराष्ट्र चली गयी।उनमे खानदेश में आज भी मौर्य राजपूत हैं जबकि कुछ मराठा बन गए और मोरे मराठा कहलाते हैं।
5-एक शाखा गुजरात चली गयी और जमीन राज्य न रहने से कम दर्जे के राजपूतो में मिल गयी और कार्डिया कहलाती है।
वास्तव में मौर्य अथवा मोरी वंश एक शुद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय राजपूत वंश है जो आज भी राजपूत समाज का अभिन्न अंग है।
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मौर्य मोरी वंश के गोत्र प्रवर आदि---
गोत्र--गौतम और कश्यप
प्रवर तीन--गौतम वशिष्ठ ब्राह्स्पत्य
वेद--यजुर्वेद
शाखा--वाजसनेयी
कुलदेव--खांडेराव
गद्दी--कश्मीर,पाटिलिपुत्र, चित्तौड़, उज्जैनी,भरमौर, सिंध,
निवास--आगरा, मथुरा, फतेहपुर सीकरी, उज्जैन, निमाड़, हरदा,इंदौर, खानदेश महाराष्ट्र ,तेलंगाना, गुजरात(karadiya में),हिमाचल प्रदेश,मेवाड़
सांस्कृतिक रिवाज--शुभ कार्यो में मोर पंख रखते हैं।
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क्या है पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार के फर्जी मौर्य नामधारियों की वास्तविकता----
आज जो जातियां पूर्वी उत्तर प्रदेश बिहार मध्य प्रदेश में पिछले पचास साल से मौर्य लिख रहे हैं उनका असली
नाम मुराव है और ये पूरब में माली का काम करते हैं इनका मौर्य क्षत्रियो से कोई लेना देना नही है,यह भी हो सकता है कि ये उन मौर्यवँशियो में हों जो बहुत बाद तक भी बौद्ध धर्म में बने रहे और इस कारण ब्राह्मणों द्वारा इन्हें शूद्र घोषित कर दिया गया हो।।
इसके अलावा जो जाती आज शाक्य लिखने लगी है
यूपी में उसका असली नाम सागड़ है।
जो जाती आज खुद को कुशवाहा लिखती है उसका असली नाम काछी है..लेकिन राजनितिक कारणों से इन्हें सम्राट अशोक का वंशज बताकर क्षत्रिय राजपूतों के इतिहास के साथ छेड़छाड़ की जा रही है।
इन माली जातियों ने मौर्य शाक्य कुशवाहा लिख कर इन टाइटल पर
कब्जा इसी प्रकार कर लिया जैसे अहीर यादव बन गये।
रेफरेंस---
1--http://www.theosophy.wiki/en/Morya
2--पुराणों में मौर्य वंश
http://www.katinkahesselink.net/blavatsky/…/v6/y1883_173.htm
3-https://en.m.wikipedia.org/…/Ancestry_of_Chandragupta_Maurya
4--आचार्य चाणक्य द्वारा रचित अर्थशास्त्र
5-जयशंकर प्रसाद कृत "चन्द्रगुप्त"
6-http://www.indianrajputs.com/view/maswadia

शनिवार, 2 सितंबर 2017

वेद और शूद्र

वेदों के बारे में फैलाई गई भ्रांतियों में से एक यह भी है कि वे ब्राह्मणवादी ग्रंथ हैं और शूद्रों के साथ अन्याय करते हैं | हिन्दू/सनातन/वैदिक धर्म का मुखौटा बने जातिवाद की जड़ भी वेदों में बताई जा रही है और इन्हीं विषैले विचारों पर दलित आन्दोलन इस देश में चलाया जा रहा है |
परंतु, इस से बड़ा असत्य और कोई नहीं है | इस श्रृंखला में हम इस मिथ्या मान्यता को खंडित करते हुए, वेद तथा संबंधित अन्य ग्रंथों से स्थापित करेंगे कि –
१.चारों वर्णों का और विशेषतया शूद्र का वह अर्थ है ही नहीं, जो मैकाले के मानसपुत्र दुष्प्रचारित करते रहते हैं |
२.वैदिक जीवन पद्धति सब मानवों को समान अवसर प्रदान करती है तथा जन्म- आधारित भेदभाव की कोई गुंजाइश नहीं रखती |
३.वेद ही एकमात्र ऐसा ग्रंथ है जो सर्वोच्च गुणवत्ता स्थापित करने के साथ ही सभी के लिए समान अवसरों की बात कहता हो | जिसके बारे में आज के मानवतावादी तो सोच भी नहीं सकते |
आइए, सबसे पहले कुछ उपासना मंत्रों से जानें कि वेद शूद्र के बारे में क्या कहते हैं  –

यजुर्वेद १८ | ४८
हे भगवन!  हमारे ब्राह्मणों में, क्षत्रियों में, वैश्यों में तथा शूद्रों में ज्ञान की ज्योति दीजिये | मुझे भी वही ज्योति प्रदान कीजिये ताकि मैं सत्य के दर्शन कर सकूं |
यजुर्वेद २० | १७
जो अपराध हमने गाँव, जंगल या सभा में किए हों, जो अपराध हमने इन्द्रियों में किए हों, जो अपराध हमने शूद्रों में और वैश्यों में किए हों और जो अपराध हमने धर्म में किए हों, कृपया उसे क्षमा कीजिये और हमें अपराध की प्रवृत्ति से छुडाइए |
यजुर्वेद २६ | २
हे मनुष्यों ! जैसे मैं ईश्वर इस वेद ज्ञान को पक्षपात के बिना मनुष्यमात्र के लिए उपदेश करता हूं, इसी प्रकार आप सब भी इस ज्ञान को ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र,वैश्य, स्त्रियों के लिए तथा जो अत्यन्त पतित हैं उनके भी कल्याण के लिये दो | विद्वान और धनिक मेरा त्याग न करें |
अथर्ववेद १९ | ३२ | ८
हे ईश्वर !  मुझे ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र और वैश्य सभी का प्रिय बनाइए | मैं सभी से प्रसंशित होऊं |
अथर्ववेद १९ | ६२ | १
सभी श्रेष्ट मनुष्य मुझे पसंद करें | मुझे विद्वान, ब्राह्मणों, क्षत्रियों, शूद्रों, वैश्यों और जो भी मुझे देखे उसका प्रियपात्र बनाओ |
इन वैदिक प्रार्थनाओं से विदित होता है कि –
-वेद में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चारों वर्ण समान माने गए हैं |
 -सब के लिए समान प्रार्थना है तथा सबको बराबर सम्मान दिया गया है |
 -और सभी अपराधों से छूटने के लिए की गई प्रार्थनाओं में शूद्र के साथ किए गए अपराध भी शामिल हैं |
 -वेद के ज्ञान का प्रकाश समभाव रूप से सभी को देने का उपदेश है |
-यहां ध्यान देने योग्य है कि इन मंत्रों में शूद्र शब्द वैश्य से पहले आया है,अतः स्पष्ट है कि न तो शूद्रों का स्थान अंतिम है और ना ही उन्हें कम महत्त्व दिया गया है |
इस से सिद्ध होता है कि वेदों में शूद्रों का स्थान अन्य वर्णों की ही भांति आदरणीय है और उन्हें उच्च सम्मान प्राप्त है |
यह कहना कि वेदों में शूद्र का अर्थ कोई ऐसी जाति या समुदाय है जिससे भेदभाव बरता जाए  –  पूर्णतया निराधार है |

वेदों का रचयिता कौन ?

सभी बड़े विद्वान और शोधकर्ता वेद को मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन पुस्तक मानते हैं। वे अपने जन्म से आज तक अपने मूल रूप में बने हुए हैं। उन्हें मूल स्वरुप में बनाए रखने वाली अनूठी विधियों को जानने के लिए पढ़ें – ‘वेदों में परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?‘ कई विद्वान इसे सृष्टि के महानतम आश्चर्यों में गिनते हैं।
जाकिर नाइक के गुरु और जाने पहचाने इस्लामिक विद्वान अब्दुल्ला तारिक भी वेदों को प्रथम ईश्वरीय किताब मानते हैं। जाकिर नाइक ने अपने वहाबी फाउंडेशन के चलते भले ही इस बात को खुले तौर पर स्वीकार न किया हो, पर इसका खंडन भी कभी नहीं किया। वेदों में मुहम्मद की भविष्यवाणी दिखाने की उनकी साजिश से इस बात की पुष्टि होती है कि वह वेदों को अधिकारिक रूप से प्रथम ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं। वैसे उनकी यह कोशिश मशहूर कादियानी विद्वान मौलाना अब्दुल हक़ विद्यार्थी की जस की तस नक़ल है।
कादियानी मुहीम का दावा ही यह था कि वेद प्रथम ईश्वरीय किताब हैं और मिर्जा गुलाम आखिरी पैगम्बर। वेद मन्त्रों के गलत अर्थ लगाने और हेर-फेर करने की उनकी कोशिश को हम नाकाम कर चुके हैं, देखें – ‘वेदों में पैगम्बर’। लेकिन इतनी कमजानकारी और इतनी सीमाओं के बावजूद वेदों को प्रथम ईश्वरीय पुस्तक के रूपमें मुसलमानों के बीच मान्यता दिलवाने की उनकी कोशिश काबिले तारीफ है।
मूलतः यह धारणा कि वेद ईश्वरीय नहीं हैं – ईश्वर को न मानने वालों और साम्यवादियों की है। हालाँकि वे वेदों को प्राचीनतम तो मानते हैं। उनकी इस कल्पना की जड़ इस सोच में है कि मनुष्य सिर्फ कुछ रासायनिक प्रक्रियाओं का पुतला मात्र है। खैर, यह लेख नास्तिकों और साम्यवादियों की खोखली दलीलों और उनकी रासायनिक प्रक्रियाओं के अनुत्तरित प्रश्नों पर विचार करने के लिए नहीं है।
गौर करने वाली बात यह है कि नास्तिकों के इस मोर्चे को अब कई हताश मुस्लिमों ने थाम लिया है, जो अपने लेखों से वेदों की ईश्वरीयता को नकारने में लगे हुए हैं। पर अपने जोश में उन्हें यह होश नहीं है कि इस तरह वे अपने ही विद्वानों को झुठला रहेहैं और इस्लाम की मूलभूत अवधारणाओं को भी ख़त्म कर रहे हैं। हम उन से निवेदन करना चाहेंगे कि पहले वे अपने उन विद्वानों के खिलाफ फ़तवा जारी करें – जो वेदों को प्रथम ईश्वरीय पुस्तक मानते हैं या उन में मुहम्मद को सिद्ध करनेकी कोशिश करते हैं, साथ ही अपनी नई कुरान को निष्पक्षता से देखने की दरियादिली दिखाएं।
इस लेखमें हम यह जानेंगे कि ऋषियों को वेदों का रचयिता क्यों नहीं माना जा सकता ? जैसा कि नास्तिकों और इन नए मुस्लिमों का कहना है। अब प्रश्न उठता है कि यदि ऋषियों ने वेद नहीं बनाए तो फिर वेदों का रचयिता कौन है? यह प्रश्न ऐसा ही है जैसे यह पूछना कि यह जीवन किस ने बनाया? यह ब्रह्माण्ड किस ने बनाया? कौन है जो इस निपुणता से सब कुछ संचालित कर रहा है? यह बुद्धिमत्ता हमें किस ने दी है? केवल मनुष्य ही क्यों बुद्धिमान प्राणी है? इत्यादि।
ये प्रश्न आत्ममंथन और विश्लेषण मांगते हैं और हम इन पर निश्चित मत रखते हैं। लेकिन क्योंकि वेद सभी को अपने विवेक से सोचने की छूट देते हैं इसलिए यदि कोई हमारे नजरिए और विचारों से सहमत न भी हुआ तो इस का मतलब यह नहीं है वेद उसे नरक की आग में झोंक देंगे और हम कहीं स्वर्ग में अंगूरों का मजा लेंगे। बल्कि यदि कोई सच की तलाश में अपनी पूरी समझ और ईमानदारी से लगता है तो ईश्वर उसे उचित उत्तम फल देते हैं। वैदिक सिद्धांतों और अंधश्रद्धावादी विचारधारा में यही फरक है। वैदिक सिद्धांतों का आधार कोई अंध श्रद्धा नहीं है और न ही कोई दबाव है, सिर्फ वैज्ञानिक और व्यवहारिक दृष्टिकोण के प्रतिवचनबद्धता है।
इस परिचय के बाद, आइए अब जाँच शुरू करें – पहले हम वेदों को ऋषिकृत बतलाने वालों का पक्ष रखेंगे और उसके बाद अपने उत्तर और तर्क देंगे।
अवैदिक दावा –
वेद ईश्वरीय नहीं हैं। वे भी रामायण, महाभारत, कुरान इत्यादि की तरह ही मानव रचित हैं। सिर्फ इतना फ़रक है कि रामायण और महाभारत के रचनाकार एक-एक ही थे और वेद, गुरु ग्रन्थ साहिब की ही तरह समय-समय पर अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा लिखे जाते रहे। इसलिए, वेद अनेक व्यक्तियों के कार्य का संग्रह मात्र हैं। इन्हीं को बाद में ‘ऋषि’ कहा जाने लगा और आगे चलकर वेदों को ‘अपौरुषेय’ सिद्ध करने के लिए ही इन ‘ऋषियों’ को ‘दृष्टा’ कहा गया। कई ग्रन्थ स्पष्टरूप से ऋषियों को ‘मन्त्रकर्ता’ कहते हैं, उदाहरण: ऐतरेय ब्राह्मण ६.१, ताण्ड्य ब्राह्मण १३.३.२४, तैत्तिरीय आरण्यक ४.१.१, कात्यायन श्रौतसूत्र३.२.८, गृहसूत्र २.१.१३, निरुक्त ३.११, सर्वानुक्रमणी परिभाषा प्रकरण २.४ , रघुवंश ५.४। आज प्रत्येक वेद मन्त्र का अपना ऋषि है -वह व्यक्ति जिसने उसमन्त्र को रचा है। इसलिए ऋषियों को वेद मन्त्रों का रचयिता न मानना एक अन्धविश्वास ही है।
अग्निवीर का उत्तर-
ऋषियों को मन्त्रों का रचयिता मानने के इस दावे का आधार ‘मन्त्रकर्ता’ शब्द या उसके मूल का किसी रूप में मौजूद होना है। हम इस पर विचार बाद में करेंगे। आइए, पहले युक्ति संगत और ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह जानें कि ऋषि वेदमन्त्रों के रचयिता क्यों नहीं माने जा सकते ? सबसे पहले इस दावे को लेते हैं- “प्रत्येक वेद मन्त्र का अपना ऋषि है -वह व्यक्ति जिसने उस मन्त्र को रचा है।”
(इस धारणा को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि मूल वेद संहिताओं में किसी ऋषि आदि का नाम समाहित नहीं है। उनमें सिर्फ वेद मन्त्र हैं। लेकिन, जिन ऋषियों ने सर्वप्रथम अपने ध्यान में जिस वेद मन्त्र या सूक्त के अर्थ को देखा या जाना उन ऋषियों के नामों का उल्लेख परम्परागत रूप से उस मन्त्र या सूक्त पर मिलता है। कात्यायन की ‘सर्वानुक्रमणी’ या ‘सर्वानुक्रमणिका’ इन ऋषियों के नामों का मूल स्त्रोतमानी गयी है (कुछ अन्य अनुक्रमणियों के अलावा।) अवैदिक लोग इन ऋषियों को वेद मन्त्रों का शोधकर्ता मानने के बजाए रचयिता मानते हैं।)
प्रतिवाद :
1. एक सूक्त के अनेक ऋषि:
a. इतिहास में ऐसी किसी रचना का प्रमाण नहीं मिलता जिसे बहुत सारे लोगों ने साथ मिलकर बिलकुल एक जैसा बनाया हो, भाषा या विषय की भिन्नता अनिवार्य है। जबकि वेदों में ऐसे अनेक सूक्त हैं जिनके एक से अधिक ऋषि हैं – दो या सौ या हजार भी।
उदाहरण के लिए : सर्वानुक्रमणिका (वैदिक ऋषियों की सूचि) में ऋग्वेद के इन मन्त्रों के एक से अधिक ऋषि देखे जा सकते हैं – ५.२, ७.१०१, ७.१०२, ८.२९, ८.९२, ८.९४, ९.५, ५.२७, १.१००, ८.६७, ९.६६, ९.१६. (आर्षनुक्रमणी).
चौबीस अक्षरों वाले गायत्री मन्त्र के ही सौ ऋषि हैं! ऋग्वेद के ८ वें मंडल के ३४ वें सूक्त के हजार ऋषि हैं!
अब हजार लोगों ने एक साथ मिलकर तीन वाक्यांश कैसे बनाए? यह तो अवैदिक बुद्धिवादी ही जानें!
b. कुछ लोग यह दलील दे सकते है कि सर्वानुक्रमणी के लेखक कात्यायन के समय तक ऐतिहासिक परम्परा टूट चुकी थी इसलिये उन्होंने एक मन्त्र के साथ अनेक ऋषियों के नाम ‘वा’ (या) का प्रयोग करते हुए जोडे कि – इनमें से किसी एक ने यह मन्त्र बनाया है। लेकिन यह दलील देकर प्रश्नों से बचा नहीं जा सकता, यदि आप सर्वानुक्रमणी को विश्वसनीय नहीं मानते तो उसका सन्दर्भ देते ही क्यों हैं?
एक उदाहरण देखें – यास्क के निरुक्त में कई मंत्रों के गूढ़ अर्थ दिए गए हैं और वह सर्वानुक्रमणी से पुराना माना गया है। आचार्य शौनक की बृहद्ददेवता मुख्यतः निरुक्त पर ही आधारित है। इसी बृहद्ददेवता का उपयोग कात्यायन ने सर्वानुक्रमणी की रचना में किया था। निरुक्त ४.६ में ऋग्वेद १०.५ का ऋषि ” त्रित” कहा गया है। बृहद्ददेवता३.१३२ – ३.१३६ में भी यही है। जबकि, कात्यायन ने कई ऋषियों का नाम सूचीबद्ध करके उनको ‘वा’ से जोड़ दिया है। इससे पता चलता है कि कात्यायन द्वारा एक मन्त्र से अनेक ऋषियों के नाम जोड़ने का कारण उस मन्त्र का अनेक ऋषियों द्वारा साक्षात्कार किया जाना है, ऐतिहासिक परम्परा का टूटना नहीं।
निरुक्त१.४ के अनुसार ‘वा’ का प्रयोग केवल ‘विकल्प’ के रूप में ही नहीं बल्कि ‘समूह’ का बोध कराने के लिए भी होता है। वैजयंती कोष का मत भी यही है।
कात्यायन ने स्वयं भी सर्वानुक्रमणी में ‘वा’ का उपयोग विभिन्न सन्दर्भों में किया है – परिभाषा प्रकरण में वह स्पष्ट लिखते हैं कि – जब ‘वा’ का उपयोग करके किसी ऋषि का नाम दिया जाता है तो इसका अर्थ है कि पहले ऋषि के उपरांत इस ऋषि ने भी इस वेद मन्त्र को जाना था। अधिक जानकारी के लिए देखें- ऋग्वेदअनुक्रमणी – ३.२३, ५.२४, ८.४, ९.९८. और यदि हम शौनक रचित आर्षानुक्रमणी ९ .९८ को देखें तो उस में – ‘च’ (और) का प्रयोग मिलेगा, जहाँ सर्वानुक्रमणी में कात्यायन ‘वा’ का प्रयोग करते हैं। इसी तरह सर्वानुक्रमणी ८.९२और आर्षानुक्रमणी ८.४० में हम पाएंगे कि जहाँ कात्यायन ने ‘वा’ का प्रयोग करते हैं वहीँ शौनक ‘च’ का प्रयोग करते हैं। इसी तरह सर्वानुक्रमणी १.१०५। अतः इन से प्रमाणित होता है कि ऋषि वेदों के रचयिता नहीं हो सकते।
c. कुछ लोग कह सकते हैं कि एक सूक्त के मन्त्र अलग- अलग ऋषियों द्वारा बनाए गए इसलिए एक सूक्त के अनेक ऋषि हैं। परन्तु यह दावा कोई दम नहीं रखता, क्योंकि कात्यायन जैसे ऋषि से इस तरह की भूल होना संभव नहीं है।
सर्वानुक्रमणी में ऋग्वेद९ .६६ – ‘पवस्व’ सूक्त के १०० ‘वैखानस’ ऋषि हैं, जबकि सूक्त में मन्त्र ही केवल ३० हैं। ३ मन्त्रों के १००० ऋषि भी हम देख चुके हैं।

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जहाँ कहीं भी – एक सूक्त के मंत्रों को भिन्न-भिन्न ऋषियों ने देखा है -कात्यायन ने इसका स्पष्ट उल्लेख किया है। जैसे, सर्वानुक्रमणी – ऋग्वेद ९ .१०६ – चौदह मन्त्रों वाले ‘इन्द्र्मच्छ’ सूक्त में – ‘चक्षुषा’ ने ३, ‘मानव चक्षु’ ने ३, ‘अप्स्व चक्षु’ ने ३ और ‘अग्नि’ ने ५ मन्त्रों के अर्थ अपनी तपस्या से जानें। सर्वानुक्रमणी – ऋग्वेद 5 वें मंडल के 24 वें सूक्त के चारों मन्त्र – चार विभिन्न ऋषियों द्वारा जाने गए। इसी तरह देखें,सर्वानुक्रमणी – ऋग्वेद १०.१७९ और १०.१८१।.
इसलिए, एक सूक्त के मन्त्रों को विभिन्न ऋषियों ने बनाया – ऐसा निष्कर्ष निकालना गलत होगा। इसका समाधान यही है कि – ऋषि वह ‘तज्ञ’ थे जिन्होनें वेद मन्त्रों के अर्थ को जाना था।
2. एक मन्त्र के अनेक ऋषि:
– वेदों में ऐसे अनेक मन्त्र हैं जो कई बार, कई स्थानों पर अलग- अलग सन्दर्भों में आए हैं। किन्तु उनके ऋषि भिन्न-भिन्न हैं। यदि ऋषियों को मन्त्र का निर्माता माना जाए तो सभी स्थानों पर एक ही ऋषि का नाम आना चाहिए था।
उदाहरण : ऋग्वेद १.२३.१६-१८ और अथर्ववेद १.४.१-३
ऋग्वेद १०.९.१-७ और अथर्ववेद १.५.१-४/ १.६.१-३
ऋग्वेद १०.१५२.१ और अथर्ववेद १.२०.४
ऋग्वेद १०.१५२.२-५ और अथर्ववेद १.२१.१-४
ऋग्वेद १०.१६३.१,२,४ और अथर्ववेद २.३३.१,२,५
अथर्ववेद ४.१५.१३ और अथर्ववेद ७.१०३.१
ऋग्वेद १.११५.१ और यजुर्वेद १३.१६
ऋग्वेद १.२२.१९ और यजुर्वेद १३.३३
ऋग्वेद १.१३.९ और ऋग्वेद ५.५.८
ऋग्वेद १.२३.२१-२३ और ऋग्वेद १०.९.७-९
ऋग्वेद ४.४८.३ और यजुर्वेद १७.९१
इन सभी जोड़ियों में ऋषियों की भिन्नता है। ऐसे सैंकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं। एक ही मन्त्र के इतने सारे ऋषि कैसे हुए, इसे समझने का मार्ग एक ही है कि हम यह मान लें – ऋषि मन्त्रों के ज्ञाता ही थे, निर्माता नहीं।
3. वेद मन्त्र ऋषियों के जन्म के पहले से विद्यमान थे।
इसके पर्याप्त प्रमाण हैं कि वेद मन्त्र – ऋषियों के जन्म से बहुत पहले से ही थे, फ़िर ऋषि उनके रचयिता कैसे हुए?
उदाहरण :
a.सर्वानुक्रमणी के अनुसार ऋग्वेद १.२४’ कस्य नूनं ‘ मन्त्र का ऋषि ‘ शुनः शेप ‘ है। वहां कहा गया है कि १५ मन्त्रों के इस सूक्त का ऋषि, अजीगर्त का पुत्र शुनः शेप है। ऐतरेय ब्राह्मण ३३.३, ४ कहता है कि शुनः शेप नेकस्य नूनं मन्त्र से ईश्वर की प्रार्थना की। वररुचि के निरुक्त समुच्चय में इसी मन्त्र से अजीगर्त द्वारा ईश्वर आराधना का उल्लेख है। इस से स्पष्ट है कि पिता -पुत्र दोनों ने इस मन्त्र से ईश्वर प्रार्थना की। यदि शुनः शेप को मन्त्र का रचयिता माना जाए तो यह कैसे संभव है कि उसके पिता भी यह मन्त्र पहले से जानते हों?
पिता ने पुत्र से यह मन्त्र सीख लिया हो, ऐसा प्रमाण भी ऐतरेय ब्राह्मण और निरुक्त समुच्चय में नहीं है।
स्पष्ट है कि यह मन्त्र अवश्य ही उसके पिता के समय भी था परन्तु इसका ऋषि शुनःशेप ही है। इस से पता चलता है कि ऋषि मन्त्रों के ज्ञाता थे, रचयिता नहीं थे।
b. तैत्तिरीय संहिता ५.२.३ और काठक संहिता २०.१० – विश्वामित्र को ऋग्वेद ३.२२ का ऋषि कहते हैं। जबकि सर्वानुक्रमणी ३.२२ और आर्षानुक्रमणी ३.४ के अनुसार यह मन्त्र विश्वामित्र के पिता ‘गाथि’ के समय भी था। इस मन्त्र के ऋषि गाथि और विश्वामित्र दोनों ही हैं। यह सूचित करता है कि ऋषि मन्त्रों के ज्ञाता थे, रचयिता नहीं थे।
c. सर्वानुक्रमणी के अनुसार ऋग्वेद १०.६१ और ६२ का ऋषि ‘नाभानेदिष्ठ’ है। ऋग्वेद १०.६२ के१० वें मन्त्र में ‘यदु’ और ‘तुर्वशु’ शब्द आते हैं। कुछ लोग इसे ऐतिहासिक राजाओं के नाम मानते हैं। (हम मानते हैं कि यदु और तुर्वशु ऐतिहासिक नाम नहीं हैं किन्तु किसी विचार का नाम हैं।)
महाभारत आदिपर्व ९५ के अनुसार यदु और तुर्वशु – मनु की सातवीं पीढ़ी में हुए थे (मनु – इला – पुरुरवा – आयु – नहुष – ययाति – यदु – तुर्वशु.)
महाभारत आदिपर्व ७५.१५ -१६ में यह भी लिखा है कि नाभानेदिष्ठ मनु का पुत्र और इला का भाई था। इसलिए अगर वेदों में इतिहास मानें और यह मानें कि नाभानेदिष्ठ ने इस मन्त्र को बनाया तो कैसे संभव है कि वह अपने से छठीं पीढ़ी के नाम लिखे? इसलिए या तो वेदों में इतिहास नहीं है या नाभानेदिष्ठ मन्त्रों का रचयिता नहीं है।
कुछ लोग कहते हैं कि नाभानेदिष्ठ बहुत काल तक जीवित रहा और अंतिम दिनों में उस ने यह रचना की। यह भी सही नहीं हो सकता क्योंकि ऐतरेय ब्राह्मण ५ .१४ के अनुसार उसे गुरुकुल से शिक्षा प्राप्त करके आने के बाद पिता से इन मन्त्रों का ज्ञान मिला था।
निरुक्त २.३ के अर्थ अनुसार यदु और तुर्वशु ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं बल्कि एक प्रकार के गुणों का प्रतिनिधित्व करने वाले मनुष्य हैं।
d. ऐतरेय ब्राह्मण ५.१४, तैत्तिरीय संहिता ३.१.३ और भागवत ९.४.१ – १४ में कथा आती है कि नाभानेदिष्ठ के पिता मनु ने उसे ऋग्वेद दशम मंडल के सूक्त ६१ और ६२ का प्रचार करने के लिए कहा। इस से स्पष्ट है कि उसके पिता इन सूक्तों को जानते थे और नाभानेदिष्ठ भले ही इस का ऋषि है पर वह इनका रचयिता नहीं हो सकता।
e. ऋग्वेद मन्डल ३ सूक्त ३३ के ऋषि विश्वामित्र हैं, जिसमें ‘विपात’ और ‘शुतुद्रि’ का उल्लेख है। निरुक्त २.२४ और बृहद्ददेवता ४.१०५ – १०६ में आई कथा के अनुसार – विश्वामित्रराजा सुदास के पुरोहित थे और वे विपात और शुतुद्रि नामक दो नदियों के संगम पर गए। जबकि महाभारत आदिपर्व १७७.४-६ और निरुक्त ९.२६ में वर्णन है कि महर्षि वशिष्ठ ने इन नदियों का नामकरण
– विपात और शुतुद्रि किया था। और यह नामकरण राजा सुदास के पुत्र सौदास द्वारा महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों का वध किए जाने के बाद का है। यदि विश्वामित्र इन मन्त्रों के रचयिता माने जाएँ तो उन्होंने इन नामों का उल्लेख वशिष्ठ से बहुत पहले कैसे किया? सच्चाई यह है कि इन मन्त्रों का अस्तित्व विश्वामित्र के भी पहले से था। और इस में आये विपात और शुतुद्रि किन्हीं नदियों के नाम नहीं हैं। बल्कि बाद में इन नदियों का नाम वेद मन्त्र से लिया गया। क्योंकि वेद सबसे प्राचीनतम पुस्तक हैं इसलिए किसी व्यक्ति या स्थान का नाम वेदों पर से रखा जाना स्वाभाविक है। जैसे आज भी रामायण, महाभारत इत्यादि में आए शब्दों से मनुष्यों और स्थान आदि का नामकरण किया जाता है।
f. सर्वानुक्रमणी वामदेव को ऋग्वेद ४.१९, २२, २३ का ऋषि बताती है। जबकि गोपथ ब्राह्मण उत्तरार्ध ६.१ और ऐतरेय ६.१९ में लिखा है कि विश्वामित्रइन मन्त्रों का द्रष्टा (अर्थ को देखने वाला) था और वामदेव ने इस का प्रचार किया। अतः यह दोनों ऋषि मन्त्रों के तज्ञ थे, रचयिता नहीं।
g. सर्वानुक्रमणी में ऋग्वेद १०.३० – ३२ का ऋषि ‘कवष ऐलुष’ है। कौषीतकीब्राह्मण कहता है कि कवष ने ‘भी’ मन्त्र जाना – इस से पता चलता है कि मन्त्रों को जाननेवाले और भी ऋषि थे। इसलिए ऋषि मन्त्र का रचयिता नहीं माना जा सकता।
4.’मन्त्रकर्ता’ का अर्थ ‘मन्त्र रचयिता’ नहीं :
‘कर्ता’ शब्द बनता है ‘कृत्’ से और ‘कृत्’ = ‘कृञ्’ + ‘क्विप्’ ( अष्टाध्यायी ३.२.८९ )।
‘कृञ्’ का अर्थ –
– निरुक्त २.११ – ऋषि का अर्थ है -“दृष्टा” (देखनेवाला) करता है, निरुक्त३.११ – ऋषि को “मन्त्रकर्ता ” कह्ता है। अतः यास्क के निरुक्त अनुसार “कर्ता ” ही “मन्त्रद्रष्टा” है। ‘कृञ्’ धातु ‘करने’ के साथ ही ‘देखने’ के सन्दर्भ में भी प्रयुक्त होता है। ‘कृञ्’ का यही अर्थ, सायण ऐतरेयब्राह्मण(६.१) के भाष्य में, भट्ट भास्कर तैत्तरीय आरण्यक (४.१.१) के भाष्य में और कात्यायन गर्ग श्रौतसूत्र (३.२.९) की व्याख्या में लेते हैं।
– मनुस्मृति में ताण्ड्य ब्राह्मण (१३.३.२४) की कथा आती है। जिसमें मनु “मन्त्रकर्ता” का अर्थ मन्त्र का “अध्यापक” करते हैं। इसलिए ‘कृञ्’ धातु का अर्थ “पढ़ाना” भी हुआ। सायण भी ताण्ड्य ब्राह्मण की इस कथा में “मन्त्रकर्ता” का अर्थ “मन्त्र दृष्टा” ही करते हैं।
– अष्टाध्यायी (१.३.१) पतंजलि भाष्य में ‘कृञ्’ का अर्थ “स्थापना” या “अनुसरण” करना है।
– जैमिनी के मीमांसा शास्त्र (४.२.३) में ‘कृञ्’ का अर्थ “स्वीकारना” या “प्रचलित” करना है।
वैदिक या उत्तर वैदिक साहित्य में ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि “मन्त्रकर्ता” या “मन्त्रकार” या इसी तरह का कोई दूसरा शब्द मन्त्रों के रचयिता के लिए प्रयुक्त हुआ हो।
सर्वानुक्रमणी (परिभाषा २.४) में स्पष्ट रूप से मन्त्र का ‘ दृष्टा’ या मन्त्र के अर्थ का ‘ज्ञाता’ ही, उस का “ऋषि” है।
अत: अवैदिक लोगों ने जितने भी सन्दर्भ ऋषियों को ‘मन्त्रकर्ता’ बताने के लिए दिए, उन सभी का अर्थ ‘मन्त्रदृष्टा’ है।
प्राचीन साहित्य में ‘मन्त्रदृष्टा’ के कुछ उदाहरण :
तैत्तिरीय संहिता१.५.४, ऐतरेय ब्राह्मण ३.१९, शतपथ ब्राह्मण ९.२.२.३८, ९.२.२.१, कौषीताकिब्राह्मण १२.१, ताण्ड्य ब्राह्मण ४.७.३, निरुक्त २.११, ३.११, सर्वानुक्रमणी२.१, ३.१, ३.३६, ४.१, ६.१, ७.१, ७.१०२, ८.१, ८.१०, ८.४२, बृहद्ददेवता १.१, आर्षानुक्रमणी १.१, अनुवाकानुक्रमणी २,३९,१.१।
अचरज की बात है कि जिन मन्त्रों का हवाला देकर अवैदिक दावा करते हैं कि इनको ऋषियों ने बनाया, वही बताते हैं कि ऋषि इनके ‘ज्ञाता’ या ‘दृष्टा’ थे। अत: यह गुत्थी यहीं सुलझ जाती है।

शंका:
वेदों में आए नाम जैसे विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज इत्यादि जो वेद मन्त्रों के ऋषि भी हैं और ऐतिहासिक व्यक्ति भी, इनके लिए आप क्या कहेंगे ?
समाधान:
यह सभी शब्द ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम नहीं अपितु विशेष गुणवाचक नाम हैं। जैसे शतपथ ब्राह्मण में आता है कि प्राण मतलब वशिष्ठ, मन अर्थात भरद्वाज, श्रोत (कान) मतलब विश्वामित्र इत्यादि। ऐतरेय ब्राह्मण २.२१ भी यही कहता है। ऋग्वेद
८.२.१६ में कण्व का अर्थ – मेधावी व्यक्ति है – निघण्टु (वैदिककोष) के अनुसार।
शंका:
इसका क्या कारण है कि कई मन्त्रों के ऋषि वही हैं, जो नाम स्वयं उस मन्त्र में आए हैं?
समाधान:
आइए देखें कि किसी को कोई नाम कैसे मिलता है। नाम या तो जन्म के समय दिया जाता है या अपनी पसंद से या फिर अपने कार्यों से या प्रसिद्धि से व्यक्ति को कोई नाम मिलता है। अधिकतर महापुरुष अपने जन्म नाम से अधिक अपने कार्यों या अपने चुने हुए नामों से जाने जाते हैं। जैसे पं.चंद्रशेखर “आजाद” कहलाए, सुभाषचन्द्र बोस को “नेताजी” कहा गया, मूलशंकर को हम “स्वामी दयानंद सरस्वती” कहते हैं, मोहनदास “महात्मा” गाँधी के नाम से प्रसिद्ध हैं। “अग्निवीर” कहलाने वालों के असली नाम भी शायद ही कोई जानता हो।
इसी तरह जिस ऋषि ने जिस विषय का विशेष रूप से प्रतिपादन या शोध किया – उनका वही नाम प्रसिद्ध हुआ है।
– ऋग्वेद १०.९० पुरुष-सूक्त – जिसमें विराट पुरुष अथवा परमेश्वर का वर्णन है – का ऋषि “नारायण” है – जो परमेश्वर वाचक शब्द है।
– ऋग्वेद १०.९७ – जिसमें औषधियों के गुणों का प्रतिपादन है, इसका ऋषि “भिषक् ” अर्थात वैद्य है।
– ऋग्वेद १०.१०१ का ऋषि “बुध: सौम्य” है अर्थात बुद्धिमान और सौम्य गुणयुक्त – यह इस सूक्त के विषय अनुरूप है।
ऐसे सैंकड़ों उदाहरण मिलेंगे।
वैदिक ऋषियों को अपने नामों की प्रसिद्धि की लालसा नहीं थी। वे तो जीवन – मृत्युके चक्र से ऊँचे उठ चुके, वेदों के अमृत की खोज में समर्पित योगी थे। इसलिए नाम उनके लिए केवल सामाजिक औपचारिकता मात्र थे।
महर्षि दयानंद के शब्दों में – “जिस-जिस मंत्रार्थ का दर्शन जिस -जिस ऋषि को हुआ और प्रथम ही जिसके पहिले उस मन्त्र का अर्थ किसी ने प्रकाशित नहीं किया था; किया और दूसरों को पढाया भी। इसलिए अद्यावधि उस-उस मन्त्र के साथ ऋषि का नाम स्मरणार्थ लिखा आता है। जो कोई ऋषियों को मन्त्र कर्ता बतलावें उनको मिथ्यावादी समझें। वे तो मन्त्रों के अर्थप्रकाशक हैं।”
इन मन्त्रों का रचयिता भी वही – इस ब्रह्माण्ड का रचयिता – विराट पुरुष है। जिसने यह जीवन, यह बुद्धि, यह जिज्ञासा और यह क्षमता प्रदान की, जिससे हम जान सकें कि ‘ वेद किसने रचे?’ भले ही कोई इस पर असहमत हो फिर भी – वेदों के रचयिता के बारे में सबसे अच्छा और प्रामाणिक समाधान यही है।
(साभार अग्निवीर ब्लॉग दर्शन)

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

भारतीय लोकतन्त्र में इस्लाम का कितना खौफ ?

15 अगस्त 1947 को स्वतन्त्रता प्राप्ति तक हिन्दुओं ने कासिम से औरंगजेब तक इस्लाम के नाम पर जघन्य अत्याचार झेले थे किन्तु स्वतन्त्रता के समय तक उन्हें काफी हद तक भुला दिया गया था और भुला दिया जाना भी चाहिए था। सदियाँ और पीढ़ियाँ बीत चुकी थी.! किन्तु दुर्भाग्य से औरंगी मानसिकता अभी तक जीवित थी जो भारत-पाकिस्तान के विभाजन के रूप में सामने आई। विभाजन मात्र भारतवर्ष का विभाजन ही नहीं था वरन लाखों-करोड़ों हिन्दू सिक्खों के लिए इस्लामिक आक्रमण काल का पुनर्योदय था जिसने उनकी संपत्ति, परिवार, पत्नी-बहन-बेटियाँ और घर सब कुछ छीन लिया। वे लुटे पिटे भारत आए।
भारत ने हिन्दू परिवारों को आश्रय तो दिया किन्तु भारत में बसे मुसलमानों से उसके एवज में बसूली नहीं की.! वे भयभीत तो थे किन्तु हिन्दू उदारता ने उनके भय को निरर्थक सिद्ध कर दिया। भारतीय राजनीति और संविधान ने भी पूरी सहिष्णुता का परिचय दिया, अंततोंगत्वा सहिष्णुता तो उचित ही थी और हिन्दू मूल्यों के अनुरूप भी! किन्तु भारत के दुर्भाग्य का दूसरा अध्याय फिर प्रारम्भ हो गया जब हिन्दू सहिष्णुता को छुद्र स्वार्थों के लिए कुछ गद्दारों ने पुनः छलना प्रारम्भ कर दिया। भारत की एक पंथनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में स्थापना को हिंदुओं ने उस समय भी स्वीकार लिया जब मजहब के आधार पर उन्होने अपने देश के दो (तीन) टुकड़े होते हुए देखे थे और मजहब के आधार पर ही हिन्दुओं को लुटते और हिन्दू औरतों का बलात्कार होते देखा था, किन्तु उदारता और आधुनिकता का चोला ओढ़े संकीर्ण राजनीति ने उसमें भी हिन्दुओं के साथ छल किया। पंथनिरपेक्ष राष्ट्र का संविधान स्थान-स्थान पर हिन्दू मुसलमानों के सन्दर्भ में अलग अलग बातें करता दिखाई देने लगा। फिर चाहे वह कश्मीर हो, विवाह अधिनियम हो, हज सब्सिडि हो, अल्पसंख्यकों के नाम पर करदाताओं के पैसों से दी जाने वाली भेदभावपूर्ण विशेष सुविधाएं हों, मस्जिदों को स्पेशल छूट और मंदिरों से बसूला जाने वाला कर हो अथवा मस्जिदों के लिए सरकारी जमीन और मंदिरों का सरकारी अधिग्रहण हो, प्रत्येक स्थान पर हिन्दू पंथनिरपेक्षता का बोझ ढोता रहा है।
सतत मुस्लिम परस्त होती पंथनिरपेक्षता की परिभाषाओं से स्थित इतनी बिगड़ गई कि अब तो संविधान भी नागरिक समानता की रक्षा करने में असमर्थ होता जा रहा है, जितना यह चाहता भी है! बात अब तक कश्मीर में कश्मीरी पण्डितों की, अमरनाथ यात्रा की, असम में बोडो हिन्दुओं की अथवा केरल में जेहादी शोर की ही थी जहां कानून और सत्ता बेबस खड़ी तमाशा देखती रहती है किन्तु अब तो देश की राजधानी में भी शासन और प्रशासन संगठित कट्टरतावाद के चरणों में नतमस्तक दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली के चाँदनी चौक क्षेत्र में, जहां कि प्रसिद्ध लालकिला और जामामस्जिद स्थित हैं, मेट्रो की खुदाई के दौरान पुरातात्विक अवशेष प्राप्त हुए थे जिसके बाद जमीन पुरातात्विक विभाग (एएसआई) के पास चली गयी। किन्तु एएसआई कुछ निष्कर्ष निकाले और जमीन के विषय में कुछ निर्णय हो इससे पहले ही वहाँ के मुसलमानों ने उसे शाहजहाँकालीन कालीन अकबरावादी मस्जिद घोषित कर दिया और रातों रात उस पर मस्जिद भी बना डाली। यह निर्माण किसी गाँव अथवा कस्बे में नहीं वरन राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के हृदय क्षेत्र चाँदनी चौक में किया गया किन्तु आश्चर्य कि दिल्ली पुलिस, जिसका स्लोगन है “हम तुरंत कार्यवाही करते हैं”, को खबर तक नहीं लगी.! कम से दिल्ली पुलिस का ऐसा ही कहना है। न्यायालय द्वारा जमीन पर किसी भी प्रकार के धार्मिक क्रियाकलाप पर रोक लगाने का आदेश भी जारी हुआ किन्तु कई दिनों तक नमाज़ पढ़ने से रोकने का साहस दिल्ली सरकार अथवा दिल्ली पुलिस नहीं कर सकी। विश्वहिंदू परिषद आदि हिन्दू संगठन इस अतिक्रमण के खुले विरोध में उतर आए और हिन्दू महासभा की याचिका पर न्यायालय ने अवैध मस्जिद को तत्काल गिरने का आदेश जारी कर दिया। यह आदेश मिलते ही दिल्ली पुलिस की सारी वास्तविकता सामने आ गयी। दिल्ली पुलिस ने न्यायालय में निर्लज्जता से हाथ खड़े करते हुए कह दिया कि अवैध मस्जिद गिराना उसके बस की बात नहीं है.! यह इस बात का सूचक है कि जिन मुसलमानों को राजेन्द्र सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र समिति जैसे सरकारी आडंबरों का प्रयोग कर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष राजनेता दबा कुचला पिछड़ा और वंचित बताकर तुष्टीकरण का घिनौना खेल खेल रहे हैं, उस मुसलमान समुदाय की वास्तविक स्थिति देश में क्या है। बात-बात पर देश की अखंडता, राष्ट्रीय हितों और संविधान को पलीता लगाकर अपने दीनी हक़ का शोर मचाने वाले समुदाय की मानसिकता एवं शासन और प्रशासन का इस मानसिकता के सामने भीगी बिल्ली बनकर मिमियाना देश की संप्रभुता और संविधान के मुंह पर तमाचा ही कहा जा सकता है। यह तमाचा स्वयं में अनोखा नहीं है, दिल्ली उच्च-न्यायालय लम्बे समय से जामा मस्जिद के शाही इमाम अहमद बुखारी के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी कर रहा है किन्तु दिल्ली पुलिस की हिम्मत नहीं पड़ रही कि वह बुखारी को गिरफ्तार करे! दिल्ली पुलिस न्यायालय में जाकर बताती है कि उसे बुखारी नाम का कोई सख्श इलाके में मिला ही नहीं.! पूर्व में शाही इमाम रहे अब्दुल्लाह बुखारी ने तो दिल्ली के रामलीला मैदान से खुली घोषणा की थी कि वो आईएसआई का एजेंट है और यदि भारत सरकार में हिम्मत है तो उसे गिरफ्तार कर ले.! सरकार और पुलिस तमाशा देखने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकते थे.? यदि देश में राष्ट्रीय हितों की राजनीति हो रही होती तो कैसे मान लिया जाए कि कोई बुखारी राष्ट्रीय भावना और कानून से ऊपर हो सकता है अथवा भारत माँ को डायन कहने वाला कोई आज़म खाँ एक प्रदेश की सरकार में मंत्री बन सकता है??
प्रश्न उठता है कि क्या शासन और प्रशासन को इतना भय किसी बुखारी अथवा आज़म से लगता है कि देश का कानून बार बार बौना साबित होता रहे.? यह भय उस मानसिकता से है जो देश से पहले दीन-ए-इस्लाम को अपना मानती है। निश्चित रूप से हर मुसलमान को हम इस श्रेणी में नहीं रख सकते और न ही रखना चाहते हैं किन्तु यह सत्य है कि बहुमत इसी मानसिकता के साथ है अन्यथा शाहबानों जैसे मामले में संविधान और सर्वोच्च न्यायालय को धता बताकर कानून नहीं बदले गए होते, मोहनचन्द्र शर्मा के बलिदान पर सवाल नहीं खड़े किए गए होते, अफजल की फांसी को लटकाकर नहीं रखा जाता और बुखारी पर केस वापस लेने की अर्जी लेकर दिल्ली सरकार न्यायालय के पास नहीं गिड़गिड़ाती.! गिलानी जैसे गद्दार देश की राजधानी में आकर बेधड़क चीखकर चले जाते हैं कि कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं है और भारत सरकार उनके कार्यक्रम को सरकारी सुरक्षा मुहैया कराने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं कर पाती है.!
तर्क दिया जाता है कि बुखारी को गिरफ्तार करने अथवा अवैध मस्जिद को गिराने से दंगे भड़क उठेंगे, प्रश्न उठता है कि सैकड़ों साल पुराने हिन्दू मंदिरों को सरकारी आदेश पर जब गिरा दिया जाता है या अधिग्रहण कर लिया जाता है अथवा हिन्दुओं के शीर्ष धर्मगुरु कांची शंकराचार्य को दीपावली के अवसर पर सस्ते आरोपों में गिरफ्तार कर लिया जाता है तब दंगे क्यों नहीं भड़क उठते.? तब विरोध अधिकतम शासन और प्रशासन तक ही सीमित क्यों रहता है? क्या यह 1919-24 के खिलाफत आंदोलन की मानसिकता नहीं है कि इस्लाम का शोर उठते ही सामाजिक राष्ट्रीय प्रत्येक हित को किनारे लगा दिया जाता है और शुरुआत दंगों से होती है? भारत-पाकिस्तान विश्व कप में फ़ाइनल सेमीफ़ाइनल खेल रहे हों तो भारत के शहरों में अघोषित कर्फ़्यू लगता है, पाकिस्तान में ओसामा मारा जाता है तो भारत में शोकसभाएं होती हैं अथवा अमेरिका में कुरान जलाने की बात होती है तो भारत में हिंसा भड़क उठती है.!
इतिहास की मानसिकता अभी तक जीवित है अतः वर्तमान में इतिहास का प्रतिबिम्ब भी झलकता है। यदि भारत को जीवित रखना है तो भारत को पाकिस्तान बनने से रोकना होगा और इसके लिए आवश्यक है कि कट्टरपंथ के आगे घुटने टेकने की आदत को बदला जाए। वास्तविक पंथनिरपेक्षता को आखिर समान संवैधानिक क़ानूनों से परहेज क्यों होना चाहिए.? अन्यथा यह प्रश्न तो उठना स्वाभाविक ही है कि 21वीं सदी के लोकतन्त्र में इस्लाम से यह खौफ और हिन्दुओं के साथ ही दोगला व्यवहार क्यों.?

सोमवार, 28 अगस्त 2017

क्या गौवध वेद सम्मत है ?


भारतीय दर्शन के वेदों में ऐसे यज्ञों का कई बार जिक्र आया है जिनमे पशुओं की आहुति दी जाती है ,ऐसा सप्रमाण कर्मकांडीयों द्वारा प्रचारित एवं प्रचलित किया जाता है । किन्तु मेरा अन्तर्मन इसे स्वीकारने के लिए बिल्कुल भी तैयार नही । आजकल गौहत्या, गौमांस भक्षण को लेकर टीवी पर विद्वान धर्म गुरुओं के मध्य बहस चल रही थी कि प्राचीन धर्म शास्त्रों में गौमांस भक्षण तो ऋषि मुनियों द्वारा स्वीकार रहा है । अनेक क्लिष्ट भाषा मे श्लोक उच्चारित किये गए और उनका अर्थ बताया गया कि "अग्निसोमीय पशु" को यज्ञ के निमित्त बलि देकर उसका प्रसाद गृहण करने का जिक्र तो वेदों में बहुत अच्छी तरह मिलता है । मेरे आश्चर्य का ठिखाना नही रह जब वैदिक धर्म के सबसे बड़े प्रचारक आदि शंकराचार्य तक को इस पशुबलि खासकर "अग्निसोमीय" पशु अर्थात बैल की बलि का समर्थक बताया गया । जब बात शंकराचार्य तक चली गयी तो इसके लिए कांची कामकोटिपीठ शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती जी से विचार लेना अपेक्षित हुआ एंकर ने अपने संवाददाता के द्वारा उन्हें जोड़ा और उनसे पूँछा कि केंद्र की वर्तमान सरकार गोवध पर प्रतिबंध के नाम पर सत्ता में आई है और आज इस चुनावी वायदे से पीछे हटकर उल्टा गौरक्षकों को गुंडा कह रही है ।
इस बारे में आपके क्या विचार हैं तो शंकराचार्य श्री जयेन्द्र सरस्वती जी ने कहा कि वेदों में गोवध का विधान होते भी ऐसी मांग कैसे की जा सकती है ?" उनका इतना कहना था कि गौमांस भक्षण के पक्षकारो के चेहरे खिल उठे और वे इतने हावी हो गए कि राष्ट्रवादी टी वी चैनल ने जिस लक्ष्य से यह डिबेट रखी वो पूरी तरह ध्वस्त हो गयी अतः बाध्य होकर उसे एक लंबा ब्रेक लेना पड़ा । लेकिन मेरे मन मष्तिष्क में एक भंयकर द्वंद्ध उठ खड़ा हुआ और मुझे आधुनिक विश्वामित्र राजर्षि देवी सिंह जी महार साहब का वो उद्बोधन जो उन्होंने अप्रैल 2014 झाकड़ा(अलवर) में दिया था सहसा स्मरण हो उठा । मेरे पास उनके उस उद्बोदन की वीडियो रिकॉर्डिंग थी अतः मैंने पुनः इसे ध्यानपूर्वक सुना जिसमे उनका कहना था कि "समाज आज जितना पतित हुआ यह तो कुछ भी नही बल्कि आज से कोई 2500 वर्ष पूर्व तो इससे कहीं अधिक पतित हो चुका था । आज हम कितने ही संस्कारहीन हो गए हों किन्तु किसी भी धर्म के ठेकेदार के कहने पर हम गौमांस नही खा सकते ,गौहत्या नही कर सकते किन्तु उस समय कर्मकांडी पंडो गाँवों से हजारों गौवंश एकत्रित करवाकर यज्ञ के नाम पर उनकी निर्मम हत्या कर प्रसाद के रूप में क्षत्रियों सहित समस्त प्रजा को खिलाते थे और कहते थे कि जो गौमांस नही खाये वो आर्य नही है जैसे आजकल कुछ ठाकर कहते है कि बकरा न खायें तो काहे का राजपूत । उस विषम और धर्म के नामपर चल रहे इस पाखण्ड के विरुद्ध भी क्षत्रिय राजकुमारों ने विद्रोह किया कि यह धर्म नही हो सकता यह तो अधर्म है । इस महा पाखण्ड का जो सबसे सशक्त विद्रोह किया वो किया राजकुमार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध ने । उन्होंने कहा कि यदि गौमांस खाने से ही कोई आर्य बनता तब तो कुत्ते, कौवे, चील एवं गिद्धादि सभी हिंसक पशु पक्षी आर्य हो गए । कर्मकांडी पंडो ने कहा ऐसा तो वेद सम्मत है तब गौतम बुद्ध ने कहा" ऐसे वेदों को मैं नही मानता ।"
इसका अर्थ यह हुआ कि 2500 वर्ष पूर्वतक तो गौमांस भक्षण प्रचलित हो चुका था किंतु इसका विरोध निरन्तर रहा और सम्भवतः बौद्ध प्रभाव के कारण गौमांस भक्षण बंद हुआ । 2500 वर्ष पहले भी धर्म के ये तथाकथित ठेकेदार गौमांस भक्षण को वेद सम्मत बता रहे थे और आज भी शंकराचाय जयेंद्र सरस्वती जी उसे वेद सम्मत बता रहे है । में चूंकि वेदों के प्रति पूर्ण आस्थावान हूँ और गौतम बुद्ध के प्रति पूर्ण सम्मान होने पर भी में उनकी तरह यह नही कह सकती कि "मैं नही मानती वेदों को" अतः मैंने वेदों के उन श्लोकों की तह में जाने का प्रयास किया कि आखिर विवाद की जड़ कहाँ है ? अबतक में वेदों के सबसे बड़े व्याख्याकार आदि शंकराचार्य को ही मानती रही हूँ अतः उनके शंकरभाष्य के
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' वेदांतदर्शन (१,१,१) की खोजकर पढ़ा जिसमे उन्होंने लिखा है-"यथा च हृदयाद्यवदानाना मानन्तर्य नियम:"
अर्थात जैसे हृदयादि के अवदान अर्थात छेदन में आनन्तर्यक्रम का नियम है । क्या नियम बताया देखें:-
हृदयस्याग्रेश्वद्यति अथ जिह्वाया अथ वक्ष: (तै.सं.) अर्थात प्रथम उस अग्निसोमीय यज्ञ के पशु के हृदय का, फिर जिह्वा का, फिर वक्ष:स्थल का छेदन करे । ये वाक्य अग्निषोमीय यज्ञ में श्रुत है ।" 
इसका अर्थ हुआ कि वास्तव: आदि शंकराचार्य जी भी यह उदाहरण देकर यज्ञ में पशु वध को विधि सम्मत मानते थे ?
इसी प्रकार आसुरी प्रवृति के लोगों ने अपनी प्रकृति के अनुरूप यज्ञ, श्राद्ध, मधुपर्क आदि में मांसादि का विधान बतला दिया:-
" मधुपर्के तथा यज्ञे पित्र्यदैवत्वकर्मणि ।
अत्रैव पशवो हिंस्या: नान्यत्रेत्यब्रवीत् मनु: ।।
इस प्रकार के श्लोकों में यज्ञ पशुहिंसा तथा यज्ञशेष के रूप में मांसभक्षण को विधिसम्मत घोषित कर दिया जबकि मीमांसा शास्त्र में 'अपि वा दानमात्रं स्यात् भक्षशब्दानभिसम्बन्धात्' (मी. 10 !7! 15) इत्यादि सूत्रों म् यज्ञ में पशुओं के दनमात्र का विधान है, हिंसा का नही ।
अब यह बहुत उलझन का की बात हो गयी कि वेदों में यज्ञ में पशु वध और वो भी अग्निसोमीय पशु जिसका सीधा अर्थ होता है बैल की हिंसा और फिर यज्ञशेष के रूप में मांसभक्षण का विधान है ? मुझे लगता है वैदिक धर्म के सबसे बड़े व्याख्याकार ही कहीं कहीं चूक कर गए । सम्भव है महाभारत के युद्ध समस्त ज्ञानवान क्षत्रियों के इस लोक से चले जाने के बाद और चन्द्र वंश एवं नागवंश की करीब 2500 वर्ष लम्बे चले युद्ध के समय धर्मद्रोहियों ने वेदों के श्लोकों के साथ कोई छेड़छाड़ की हो और उस दूषित शास्त्रों को आधार मान शंकराचार्य जी ने शंकरभाष्य में मांशभक्षण एवं बैल एवं गाय की यज्ञ के नाम पर हत्या को वेदसम्मत घोषित कर दिया हो । या फिर यह भी सम्भव है कि आदि शंकराचार्य जी भी संस्कृत का मूल ज्ञान न रखते हों और उपलब्ध अर्थो के आधार पर ही व्याख्या कर दी हो । एक और भी बात तत्कालीन पिस्थिति में परिलक्षित होती है कि कुमारिल भट्ट से पूर्व बौद्ध प्रभाव इतना जबरदस्त था कि वैदिक मत को कोई मानने वाला ही नही बचा था अधिकांश क्षत्रिय राजपरिवार बौद्ध या जैन मत अपना चुके थे । अतः वैदिक मत की पुनः स्थापना के लिए बौद्ध और जैन मत के एकदम विपरीत धार्मिक अनुष्ठान और अनुयायियों की आवश्यकता रही होगी । चूंकि बौद्ध और जैन दोनों ही मत क्षत्रिय राजकुमारों ने जीवहिंसा विशेषतौर से गोवंश की हत्या जो यज्ञ एवं यज्ञशेष के नाम पर की जा रही थी के विरुद्ध आरम्भ किये गए थे अतः आदि शंकराचार्य जी ने पुनः पशुबलि को वेद सम्मत सिद्ध कर दिया हो । बात कुछ भी रही हो किन्तु मैं एक क्षत्राणी हूँ, और निरीह प्राणियों और विशेषतौर से गौ जैसे संपूण धर्म के प्रतीक पशु की हत्या को चाहें आदि शंकराचार्य जी शंकरभाष्य मे उचित ठहराये या आज के कांची के जयेन्द्र सरस्वती ,मैं मानने को तैयार नही । तो मुझे अब यह शोध करना ही होगा कि कहाँ पर चूके यह धर्ममूर्ति ? वेद के किस श्लोक के अर्थ से इन्हें प्रमाण मिल गया । क्योंकि वेद मेरे ही महान पूर्वजों की तपस्या के परिणाम है । जब भगीरथ माँ गंगा को धरती पर लाये तब ही गंगा जी ने कहा दिया कि जिस पात्र में मदिरापान या मांसभक्षण होगा वो मेरे जल से 3 कोटि मतलब करोड़ बार साफ करने से भी पवित्र नही हो सकता तो वो शरीर जिसमे मदिरा या मांशभक्षण हो गया कभी पवित्र हो ही नही सकता । अतः वेद के किसी श्लोक या कोई एक शब्द का कुअर्थ जिव्हा के स्वाद के लिए अवश्य किसी धर्मद्रोही ने विगत 5000 वर्ष के भीतर किया है । क्योंकि ज्ञान के सूर्य भीष्म, साक्षात ईश्वर श्री कृष्ण ने मदिरापान एवं मांशभक्षण को एकदम धर्म विरुद्ध घोषित किया है । और में आदि शंकराचार्य जी ज्ञानी मानती हूं किन्तु भीष्म या श्री कृष्ण की तुलना में कहीँ कोई स्थान नही दे सकती । वैसे वे श्लोक और शब्द मुझे इन्ही धर्म शास्त्रों में मिल गए हैं जिनके गलत अर्थ से पशुहिंसा को वेदसम्मत घोषित करने का पाप किया गया है ।

शनिवार, 26 अगस्त 2017

नरसिंघदास महराज पनवार रीवा MP...












आज एक संत की सच्ची बाते बताता हूँ ! (पोस्ट लम्बी है पर आग्रह करूँगा पढ़िए जरूर)
मेरे गाँव (रीवा से 65 किलोमीटर और इलाहबाद से 80 किलोमीटर दूर) से मात्र 5 किलोमीटर दूर पनवार गाँव है जहां पर ''नरसिंघदास महराज'' की कुटिया ''थी'' ! मेरे गाँव के एक बुजुर्ग जिनकी उम्र 105 वर्ष थी उन्होंने भी महराज को ऐसे ही बचपन से देखा जैसे मैंने मेरे बचपन में देखा था !

महराज बहुत ही फक्कड़ किस्म के थे, सामान्य सा एक लंबा कुर्ता और सिर्फ लंगोट पहनते थे ! कभी कभार नहाते थे, कोई जटाजूट नहीं,कोई तिलक नहीं,कोई पूजा पाठ नहीं, कोई आडम्बर नहीं ! उन्हें कभी किसी ने कुछ खाते नहीं देखा , हाँ पानी जरूर पीते देखे जाते थे ! जब जिधर मूड बने चल देते थे ! महीनो कुटिया से गायब हो जाते थे ! कई बार जंगलो में घुस जाते थे तो महीनो जंगल से बाहर ही नहीं निकलते थे ! किसी को अपना पांच नहीं छूने देते थे, जिसने पाँव छूने की कोशिस किया ओ लहूलुहान होता था !

एक बार हमारे रीवा के निर्दलीय सांसद और महाराजा ''मार्तण्ड सिंह जूदेव'' ने उनका पाँव छूने की कोशिस किया तो सिर पर ऐसा डंडा फटकारा की लहूलुहान हो गए ! मार खाने के बाद महाराजा साहब ने अपनी नई इम्फ़ाला कार महराज को दान करके वापस आ गए, हालांकि के अगले चुनाव में लाखो वोट से फिर से जीत गए ! महराज की कुटिया में इतना चढ़ावा आता था पर महरान ने कभी किसी धन को हाथ तक नहीं लगाया ! महराज के सबसे प्रिय सेवक ''कौशल सिंह बाघेल'' ही कुटिया का और प्राप्त दान का ध्यान रखते थे ! दान के धन से कुटिया का नवनिर्माण होता रहता था ! कुटिया में हमेसा भंडारे का आयोजन होता है !

प्रति शनिवार को कुटिया में मेला लगता था ! जिन महिलाओ को बच्चे नहीं होते थे ओ सात शनिवार कुटिया की परिक्रमा लगाती थी और उनकी मनोकमना पूरी होती थी , इसी तरह कई बीमरी का इलाज भी कुटिया के दर्शन,परिक्रमा मात्र से दूर हो जाती थी ऐसा विश्वास है लोगो का ! महराज अपनी कुटिया का दरवाजा बंद करके महीनो अंदर ही पड़े रहते थे,जिसमे लेट्रीन - बाथरूम की कोई ब्यवस्था नहीं थी ! महराज कभी कभी पास में ही जंगलो में स्थित दुअरानाथ के हनुमान जी का दर्शन करने जाते थे इस लिए सायद शनिवार को मेला लगने लगा !

एक बार महराज भयंकर बाढ़ वाली गंगा में यमुना पुल (इलाहाबाद) से कूद गए और पानी में गायब हो गए ! जब पांच छह माह तक वापस नहीं आये तो उनके भक्तो ने उनका क्रिया कर्म करके उनका तेरहवा का भोजन, भंडारा करवा रहे थे , देखा की एक जटाजूट धारी बाबा, पंगत में बैठकर खाना खा रहे है ! (पहली बार उन्हें खाना कहते देखा गया) कौशल सिंह तुरंत पहचान गए और बाबा के पाँव पर लोट गए तब महराज जी ने कौशल सिंह को डंडे से बहुत मारा, मार मार कर उन्हें बेहोस कर दिया और जाकर कुटिया में घुस गए ! और जब सात दिन बाद कुटिया से बहार निकले तो कौशल सिंह से लिपट कर बहुत रोये ! कौशल सिंह का पूरा परिवार आज भी सुखी सम्पन्न है !

कुटिया में एक बार भंडारा चल रहा था , घी ख़त्म हो गया तो कौशल सिंह महराज के पास गए और बताया तो महराज जी बोले ''जा मैया से उधार लेकर आ '' ओ समझ गए मैया कौन है ! कुटिया से लगी हुई नदी को महराज मैया कहते थे ! कौशल सिंह गए और कुटिया से एक टीन (सायद 10 किलो ) गहि ले आये और महराज को दे दिया ! महराज ने गरम कराहे में उबलते हुए घी में पानी डाल दिया ओ घी बन गया और उससे पूड़ी तलकर भंडारा पूरा किया गया ! बाद में बनिया के यहां से घी लेकर नदी में डाल दिया तो घी पानी बन गया ! ये सच्चाई मैंने गाँव के बुजुर्गो से कई बार सुना था ! ऐसे कई चमत्कार महराज जी ने किया था ! फिर कभी लिखूंगा !

महराज की कई बार फोटो खींचने की कोशिस हुई पर उनकी फोटो कैमरे में कभी कैद नहीं हुई ! कौशल सिंह के बड़ी आग्रह के बाद महराज ने कुछ फोटो खिचवाया था, आज वही है ! बाकी कभी उनकी कोई फोटो नहीं खींच सका ! जब भी निगेटिव धुलती थी तो फोटो की जगह सिर्फ एक दिया (जलते हुए दीपक) की फोटो आती थी !

एक बार महराज के हाथ से मैंने भी मार खाया था ! मैं 10वी में पढ़ रहा था किसी काम से जवा (मेरे गाँव से 12KM) से सायकल से वापस आ रहा था ! देखा की महराज खेत से सड़क की तरफ आ रहे है, करीब छह सात लोग भी पीछे पीछे लगे हुए है ! मैं दर्शन के लिए रुक गया महराज जैसे ही आये मेरे सायकल के कॅरियर में बैठ गए और बोले ''चल'' ! मेरे तो डर के मारे हाथ पाँव फूल गए फिर डर डर कर सायकल चलाने लगा और कुछ दूर जाकर गिर गया और महराज भी गिर गए ! महराज उठे और मेरा हाथ पकड़ कर उठाया सिर पर,चेहरे पर बड़े प्यार से हाँथ घुमाया और ''ओह माई गाड़ , ऐसा जोरदार थप्पड़ मारा की कई दिन तक उस कान से सुनाई नहीं दिया'' आज भी ओ थप्पड़ नहीं भूला ! महराज जी के साथ चलने वालों ने बोला ''जाओ महराज जी का आशीर्वाद मिल गया, जीवन में हमेसा ही सुखी रहोगे'' ! और ओ बात आज तक झूठी नहीं हुई !

ऐसी बहुत सी सच कहानियां है ! जिन्हे फिर कभी लिखुगा !
बाद में महराज जी ने समधी ले लिए उसी जगह महराज की समधी स्थल बन गया और आज भी उनके समाधि पर मेला लगता है !
कहने का मतलब सच्चे संत वही है जो मोह माया से कोसो दूर रहते है !
सुप्रभात मित्रो..... जय जय श्री राम .....
#NSB