सोमवार, 30 सितंबर 2013

वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण

राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र वर्ण की सैद्धांतिक अवधारणा गुणों के आधार पर है, जन्म के आधार पर नहीं | यह बात सिर्फ़ कहने के लिए ही नहीं है, प्राचीन समय में इस का व्यवहार में चलन था | जब से इस गुणों पर आधारित वैज्ञानिक व्यवस्था को हमारे दिग्भ्रमित पुरखों ने मूर्खतापूर्ण जन्मना व्यवस्था में बदला है, तब से ही हम पर आफत आ पड़ी है जिस का सामना आज भी कर रहें हैं|

वर्ण परिवर्तन के कुछ उदाहरण -

(a) ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे | परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की | ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है |

(b) ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे | जुआरी और हीन चरित्र भी थे | परन्तु बाद में उन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये |ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया | (ऐतरेय ब्राह्मण २.१९)

(c) सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए |

(d) राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया | (विष्णु पुराण ४.१.१४)
अगर उत्तर रामायण की मिथ्या कथा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ये कैसे कर पाए?

(e) राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए | पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.१.१३)

(f) धृष्ट नाभाग के पुत्र थे परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(g) आगे उन्हींके वंश में पुनः कुछ ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.२.२)

(h) भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए |

(i) विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने |

(j) हारित क्षत्रियपुत्र से ब्राह्मण हुए | (विष्णु पुराण ४.३.५)

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

! जम्मू-कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री जी की दलील !

दो दशक के प्रयास के बाद जम्मू-कश्मीर में आतंकियों पर सुरक्षा बलों को मिली बढ़त इस साल कमजोर पड़ने लगी है । पिछले साल की तुलना में इस साल आतंकियों के शिकार बने सुरक्षा बल के जवानों की संख्या सात गुना बढ़ चुकी है । वहीं मारे गए आतंकियों की संख्या में एक चौथाई कमी आई है । सुरक्षा एजेंसियों को डर है कि यदि ऐसा ही रहा तो घाटी में एक बार फिर 90 के दशक की स्थिति दोहराई जा सकती है । गृह मंत्रालय के पास मौजूद आंकड़ों के मुताबिक 2012 में आतंकी हमले में सुरक्षा बलों के सात जवान शहीद हुए थे, लेकिन इस साल इनकी संख्या बढ़कर 48 हो चुकी है । जबकि साल के तीन महीने अभी शेष बचे हैं । इसके उल्टे पिछले साल सुरक्षा बलों ने कुल 48 आतंकियों को मार गिराया था, लेकिन इस साल अभी तक केवल 39 आतंकी ही मारे गए हैं । आतंकियों के हाथों मारे जाने वाले निर्दोष नागरिकों की संख्या भी नौ से बढ़कर 10 हो चुकी है । यही हाल गिरफ्तार आतंकियों को लेकर है । पिछले साल कुल 98 आतंकियों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन इस साल अभी तक केवल 66 आतंकी गिरफ्तार किए जा सके हैं ।

गृहमंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि 90 के दशक में घाटी में आतंक चरम पर था । लेकिन 2000 के बाद इसमें लगातार कमी आती गई । 2002 में जहां 2020 आतंकी मारे गए थे और सुरक्षा बलों के 536 जवान शहीद हुए थे । 2011 तक आते-आते इनकी संख्या कम होकर क्रमश: 100 और 33 रह गईं थी । इसके बाद 2012 से घाटी में शांति की फिजा को भंग करने की पाकिस्तान की ओर कोशिश शुरू हुई और आतंकियों की घुसपैठ के लिए पाक सेना की ओर से फायरिंग की घटनाएं बढ़ गई। पिछले साल जहां सीमा पर फायरिंग की कुल 117 घटनाएं हुईं थी, इस साल उनकी संख्या अभी तक 144 हो चुकी हैं।

वैसे पाक की तमाम कोशिशों के बावजूद घाटी में आतंकियों की संख्या पिछले साल की तुलना में कोई इजाफा नहीं हुआ है। घाटी में पिछले साल की तरह अब भी लगभग 220 प्रशिक्षित आतंकी सक्रिय हैं। जबकि पाकिस्तान में आतंकियों के प्रशिक्षण के लिए 42 कैंप चल रहे हैं। इनमें 25 पाक अधिकृत कश्मीर और 17 पाकिस्तान के दूसरे इलाकों में हैं । इन कैंपों में लगभग 2500 आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है ।

सरकार इन प्रशिक्षण केन्द्रों को कब नष्ट करगी ? इस बात का अभी तक कोई योजना है क्या सरकार के पास ?  इस तरह की आतंकी घटनाओं में ब्रिधि के क्या कारण है ?   सराकर पकिस्तान प्रायोजित इस आतंकवाद को ख़त्म करने के लिए कोई एजेंडा है क्या ?  ऐसे बहुत से प्रश्न है मन में कितने लिखू ? 
       इन आकड़ो के बाद भी जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने राज्य में आतंकवाद के घटते असर के मद्देनजर वहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी कम करने की मांग की है
                      दिल्ली में आंतरिक सुरक्षा पर मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में  उमर अब्दुल्ला ने  कहा कि चूंकि राज्य में पिछले वर्ष से आतंकवाद संबंधी घटनाओं में लगातार कमी आई है । ऐसे में यहां सुरक्षा बलों की मौजूदगी में भी लगातार कमी करने की जरूरत है, ताकि राज्य के लोगों को बदले हुए माहौल का असर साफ दिखाई दे ।

       सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून [अफस्पा] की क्रमिक वापसी की मांग करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में जब आतंकवाद अपने चरम पर था, (मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला जी के अनुसार इस समय आतंकी घटनाएं कम हुई है ) उस दौरान सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों के लिए यह बहुत उपयोगी साबित हुआ है, लेकिन जो इलाके घुसपैठ और आतंकवाद की गतिविधियों से प्रभावित नहीं हैं, वहां से इसे हटाने की क्रमिक शुरुआत की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने  कहा कि उनकी सरकार आतंकवाद के खिलाफ पूरी सख्ती की वकालत करती है, लेकिन मानवाधिकार का कोई उल्लंघन भी बर्दाश्त नहीं करना चाहती ।*(क्योकि हमारी सेना के जवान तो मानव है ही नहीं ?)

उमर की प्रमुख मांगें-

- सेना और अ‌र्द्धसैनिक बलों की तदाद घटाई जाए

- सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून क्रमिक तरीके से हटे

- कश्मीर पर केंद्रीय वार्ताकारों की रिपोर्ट पर तुरंत कार्यवाही हो

- पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से टेलीफोन संपर्क कायम हो

- पुलिस के आधुनिकीकरण में केंद्रीय मदद तेज हो

गुरुवार, 26 सितंबर 2013

! सावधान - सावधान बयान वीर अभी सो रहे है !

बयान वीर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भले दंगे भड़काने वालों पर सख्त कार्रवाई करने का आह्वान कर रहे हों, भले राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक में भाग लेने वाले पक्ष-विपक्ष के तमाम राजनेता और मुख्यमंत्री उसका एकमत से समर्थन कर दें, लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि आखिर यह कार्रवाई करेगा कौन ? क्या यह कार्रवाई केन्द्र और राज्य की सरकारों को ही नहीं करनी है और यदि उन्हीं को करनी है, तो फिर यह आह्वान और समर्थन का ड्रामा किसके लिए ?

इन सभी राजनेताओं को ही तो ऎसे तत्वों पर कार्रवाई करनी है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से जारी ताजा आंकड़े बताते हैं कि पिछले एक दशक में देश में हुए साम्प्रदायिक दंगों में ढाई हजार से अधिक लोग मारे जा चुके हैं तथा लगभग 27 हजार लोग घायल हुए हैं। किसी भी सभ्य समाज के लिए यह शर्मनाक बात है कि वहां साम्प्रदायिक दंगे हों।


उससे भी अधिक आश्चर्य की बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री को दंगों में शामिल लोगों पर कड़ी कार्रवाई के लिए कहना पड़े। इसके मायने साफ हैं कि अब तक ऎसा नहीं हो रहा था। यह कहने की नहीं, समझने की बात है कि साम्प्रदायिक दंगों के अधिकांश मामलों में राजनीतिक दलों की भूमिका ही अहम रहती है। जम्मू-कश्मीर में हुए दंगे अथवा इंदिरा गांधी की हत्या के बाद फैले साम्प्रदायिक दंगों की कहानी अलग है। साम्प्रदायिक दंगों की शुरूआत के कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि बाद में इसमें राजनीतिक दल और राजनेताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।


देश साम्प्रदायिक दंगों से निजात पाना चाहता है, क्या ऎसा संभव है। दिल्ली में हुए 1984 के सिख दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए, लेकिन आज तक एक भी शक्तिशाली दोषी को सजा नहीं मिल पाई। कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है और कोई भी राज्य सरकार अगर ठान ले, तो दंगा हो ही नहीं सकता और अगर हो भी गया, तो समय रहते उसे फैलने से रोका जा सकता है। मुजफ्फरनगर के ताजा दंगों के बाद वोट बैंक के लिए खेली जा रही तुच्छ राजनीति किसी से छिपी नहीं है।

जब तक वोट बैंक की राजनीति के मोह से उबरा नहीं जाएगा, तब तक दंगों को रोकना संभव ही नहीं है। दंगे बयानों या भाषणों से नहीं, दृढ़ इच्छाशक्ति और अपने-परायों के भेद से ऊपर उठ कर ही रोके जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सभी राजनीतिक दलों को सच्चे मन से एक मंच पर आकर दिल से एक साथ खड़ा हो पाने का साहस दिखाना होगा।

ये है कांग्रेसी संस्कृति ?



कांग्रेसियों में चलन है गाँधी परिवार के पैरो में दंडवत होने का,(यदि ये दंडवत नहीं हो तो कांग्रेस में इनकी कोई ओकात नहीं ) हिमाचल प्रदेश के 79 साल से ऊपर के हो चुके मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह अपने से 13 साल छोटी सोनिया गाँधी के आगे नतमस्तक होते हुए ! बहुत बार राहुल के पैरो में कई बुजुर्ग नेताओ को देखा गया है…!

सोमवार, 23 सितंबर 2013

यूपी में चली सांप्रदायिक राजनीति का फायदा किसे होगा ?

उत्तर प्रदेश में निश्चय ही ये दंगा की राजीनीत के कारण वोटो का ध्रुवीकरण होगा और इस ध्रुवीकरण का फायदा बीजेपी और सपा को होगा । दिलचस्प बात ये होगी की इस ध्रुवीकरण में किसको अधिक फायदा होगा यह समय की गर्त में छिपा हुआ है । उत्तर प्रदेश फिर 1990 के दौर में पहुंच गया है । तब मुख्यमंत्री मुलायम यादव थे। इस बार गद्दी पर भले ही उनके बेटे अखिलेश यादव बैठे हैं लेकिन सत्ता की बागडोर उन्हीं के हाथों में है। तब बाबरी मस्जिद को लेकर सांप्रदायिक तनाव चरम पर था। इस बार दंगों को लेकर फिजा बिगड़ी हुई है। तब टकराव भाजपा और सपा (तब जनता दल) के बीच था। इस बार भी रस्साकशी इन्हीं दलों के बीच है।  
          एक चैनल के स्टिंग में पुलिस अफसरों ने बताया कि आज़म ने उन पर दो जाट युवकों की हत्या के आरोप में गिरफ्तार  आठ लोगों को रिहा करने का दबाव बनाया। आज़म डायन वाले बयान को झूठा बताते रहे हैं, वैसे ही जैसे इस बार वे पुलिस पर दबाव डालने से इंकार कर रहे हैं।  

    1990 में मुलायम के दाहिने हाथ माने जाने वाले मंत्री आज़म खां के एक बयान ने दंगों को हवा दी थी। उन्होंने भारत मां को डायन बताया था। एक हफ्ते पहले मुज़फ्फरनगर में हुए दंगों के पीछे भी उनका ही एक बयान बताया जा रहा है। आज़म ने तीन युवकों की हत्या के बाद पुलिस अधिकारियों को कहा, ‘जो हो रहा है, होने दो।’ यानी दंगा मत रोको। क्योंकि दंगे के बाद सुरक्षा की तलाश में अल्पसंख्यक सपा के करीब आएंगे।
आज वहां जो कुछ भी हो रहा है उसकी विवेचना के लिए 23 साल पहले की स्थिति समझना जरूरी है। तब मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने कहा था कि विहिप के अयोध्या मार्च को विफल करने के लिए ऐसे सुरक्षा इंतज़ाम करेंगे कि वहां परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा। लेकिन उमा भारती वेश बदलकर 30 अक्टूबर 1990 को अयोध्या पहुंच गई थीं। इससे पहले प्रदेश भर में सांप्रदायिकता-विरोधी रैलियों में मुलायम खुलकर कहते थे, ‘यदि मुसलमान ख़ुद को असुरक्षित समझते हों तो उन्हें अपने पास हथियार रखने चाहिए।’ वातावरण इतना विषैला हो गया था कि 30 अक्टूबर को अयोध्या में कारसेवकों पर फायरिंग के बाद भड़के दंगों में सैकड़ों लोग मारे गए थे। तब मुलायम को मौलाना मुलायम कहा जाता था और वे इस संबोधन पर गौरवान्वित महसूस करते थे। इस बार दंगों के दौरान अखिलेश के गोल टोपी लगाकर टीवी पर बयान देने के पीछे ‘मौलाना अखिलेश’ की छवि बनाने की कोशिश साफ दिख रही थी। 
 
2009 के लोकसभा चुनाव में अल्पसंख्यकों ने सपा के बजाए कांग्रेस को समर्थन दिया। वे मुलायम द्वारा कल्याण सिंह को सपा में शामिल किए जाने से नाराज़ थे। अप्रत्याशित रूप से कांग्रेस ने 80 में से 21 सीटें जीत लीं। मुलायम नहीं चाहते कि 2014 के चुनाव में वैसी कोई स्थित बने। ख़ासतौर पर इसलिए कि इस बार दांव पर प्रधानमंत्री का पद है। त्रिशंकु लोकसभा स्थिति में वे अपना दावा मजबूत रखना चाहते हैं। 
 
यही वजह है कि वे अल्पसंख्यकों के वोट के लिए हर संभव जतन कर रहे हैं। डेढ़ साल पहले अखिलेश सरकार के बनने के बाद से अभी तक कोई तीन दर्जन दंगे हो चुके हैं। लेकिन गिरफ्तार बमुशकिल पंद्रह-सोलह लोग हुए। वे भी छोड़ दिए गए। राज्य सरकार की हर योजना में अल्पसंख्यकों के लिए 20 फीसदी का आरक्षण है। इससे उस पर पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के आरोप लग रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा भाजपा नेताओं के मुज़फ्फरनगर जाने पर रोक लगाना और कांग्रेस नेताओं को वहां जाने की इजाजत देने के पीछे भी इसी तरह की मंशा जताई जा रही है। 
 
लेकिन क्या सपा की रणनीति कामयाब है ? अल्पसंख्यकों द्वारा अखिलेश की मुज़फ्फरनगर यात्रा के दौरान उनके विरोध में लगाए नारों को संकेत मानें तो फिलहाल यह रणनीति सफल होती नहीं दिख रही। लोकसभा चुनाव में अभी सात महीने हैं। और भाजपा के तीखे तेवर अगर यूं ही रहे तो प्रतिस्पर्धात्मक राजनीतिक सांप्रदायिकता की नीति संभवत: जारी रहेगी।
 
           देखते है २०१४ का लोकसभा चुनाव क्या क्या गुल खिलाता है ?

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

दंगो की राजनीति या दंगे पर राजनीति ?

समझ में यह नहीं आता कि हमारे देश के राजनीतिक दल और राजनेता देश से पहले अपने स्वार्थ में ही अंधे क्यों हो जाते हैं ? यह जानते हुए भी वोट बैंक की राजनीति ने देश को किस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों में जो कुछ हुआ या जो अब भी हो रहा है, क्या वाकई वह समाज में पहले से मौजूद खाई को और चौड़ा करने का काम नहीं कर रहा है ?

दंगों को रोकने में नाकामयाब रही अखिलेश यादव सरकार वोट बैंक को बचाए रखने की आड़ में जो राजनीति खेल रही है, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। दुर्भाग्यपूर्ण वह भी है, जो राज्य के दूसरे दल अपना राजनीतिक जनाधार बढ़ाने के लिए कर रहे हैं। दंगों के बाद राज्य का पुलिस प्रशासन भी यदि किसी को फंसाने और किसी को बचाने के काम में जुट गया हो, तो दंगा प्रभावित इलाकों में हालात सामान्य होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है? राज्य के मुख्यमंत्री जब दंगा प्रभावित इलाकों में निरीक्षण करने गए, तो उनके खिलाफ में और उन्हीं के साथी मंत्री के पक्ष में लगे नारे ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि राज्य सरकार पर लोगों का कितना विश्वास रह गया है।

दंगों को भड़काने के आरोप में भाजपा और बसपा के जनप्रतिनिधियों के खिलाफ वारण्ट निकलना और सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेताओं को बचाने की कवायद से क्या माहौल सुधरने की उम्मीद की जा सकती है? राज्य सरकार यदि इन दंगों को राजनीतिक साजिश मानती है, तो दंगों के बीस दिन बाद भी इस साजिश का पर्दाफाश क्यों नहीं कर पा रही है? राज्य की समाजवादी पार्टी सरकार को जवाब इस बात का भी देना होगा कि उसके शासन में आते ही दंगे क्यों उग्र रूप ले लेते हैं? राज्य के एक वरिष्ठ मंत्री की इन बातों में अगर सच्चाई है कि दूसरे राज्यों के लोग आकर वहां माहौल को बिगाड़ रहे हैं, तो वे बताएं कि फिर उनकी सरकार ऎसा होने क्यों दे रही है?

सरकार को अगर लगता है कि कोई दल या नेता माहौल को खराब करने का काम कर रहा है, तो उसे उस पर अंकुश लगाना चाहिए। साथ ही, ध्यान इस बात का रखे जाने की भी जरूरत है कि प्रशासनिक अधिकारियों के तबादलों में पक्षपात के आरोपों से बचा जाए।

ऎसा नहीं लगे कि एक अक्षम अधिकारी को तो हटाकर दंडित कर दिया जाए और वोट बैंक की राजनीति के चलते दूसरे अक्षम अधिकारी को हटाने में कोताही बरती जाए। उत्तर प्रदेश में दंगों से जो नुकसान हो गया, उसकी जल्द से जल्द भरपाई किए जाने की तो जरूरत है ही, आवश्यकता इस बात की भी है कि हर संभव और जरूरी कार्रवाई करते हुए माहौल को और खराब होने से रोका जाए।

। गड्ढे की महिमा ।

प्राचीन समय में भारत कृषि योग्य भूमि की बहुतायत के कारण कृषि प्रधान देश था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस शस्य श्यामला धरती पर गड्ढों की फसल लहलहाने लगी और यह गड्ढा प्रधान देश में तब्दील हो गया।

आज यहां हर क्षेत्र गड्ढों से समृद्ध है। सरकारी क्षेत्र हो या गैर सरकारी, गड्ढे हर जगह बहुतायत से सेवा प्रदान कर रहे हैं। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, सड़क से लेकर संसद तक सभी क्षेत्र में नाना प्रकार के गड्ढे पाए जाते हैं। ज्यादातर नजर आ जाते हैं, कुछ गड्ढे सिर्फ महसूस किए जा सकते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में गड्ढों को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कुछ लोग इन्हें साहब का खास तो कुछ दाहिना हाथ, नाक का बाल आदि नाम से जानते हैं जबकि कुछ विरोधी इन्हें मैनेजर, दलाल या चमचा तक कह डालते हैं। नाम चाहे कुछ भी हो पर यह अटल सत्य है कि जटिल या उलझे काम सिर्फ और सिर्फ गड्ढा ही करवा सकता है। किसी सामान्यजन में वह कूव्वत नहीं होती, जो गड्ढे में कूट-कूट कर भरी होती हैं। आमजन को सहजता से उपलब्ध रहते हैं।

अफसर कैबिन के अंदर मक्खियां मारता रहता है, जबकि गड्ढे बाहर गप्पे लड़ाते, धुआं उड़ाते, खैनी मलते, पान की पीक से दीवार पर कलाकृति बनाते, गुमटी पर चाय सुकड़ते हुए आसानी से मिल जाते हैं। सामान्य जन से गड्ढे बनने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है। इसमें काफी समय लगता है। इस दौरान उसे अनेक अग्नि परीक्षाओं में से होकर गुजरना पड़ता है, तब जाकर एक सच्चे उपजाऊ गड्ढे का निर्माण होता है। बाद में यही छोटा सा गड्ढा विशालकाय हो जाता है, जिसकी छत्रछाया में अनेक सह गड्ढे सुख पाते हैं। सड़क के गड्ढों का चरित्र दफ्तर के गड्ढों से अलग होता है।

सड़क के गड्ढे में उलझ वाहन के टायर, पुर्जे मरम्मत मांगते हैं। इस प्रकार वह मैकेनिक का पेट भरता है। दचकों से वाहन पर सवार लोगों के शरीर की हड्डी-पसली बराबर हो जाती है, इससे डॉक्टर का घर चलता है। ठेकेदार भी गड्ढे की ही रोटी खाते हैं। अफसरों के कमीशन की नाव भी इनके सहारे ही तैरती हैं। गड्ढा जीवन की सीधी-सपाट सड़क की नीरसता में रंग भरता है। दचके लगने से सहयात्रियों में स्पर्श सुख से रोमांस के अवसर पनपते हैं। अपने जीवन की सुख- समृद्धि से संतुष्ट होकर गड्ढे यही दुआ करते हैं कि अगले जन्म मोहे गड्ढा ही कीजो

। राजनीति व सेक्स मिलकर विस्फोटक कॉकटेल का काम करते हैं ।


विगत कुछ वर्षो में सेक्स स्केंडल्स के देश में ऎसे ढेरों मामले सामने हैं जिनमें राजनीतिज्ञ शामिल रहे हैं। कई राजनीतिज्ञ सत्ता को हर चीज पाने तथा कार्रवाई से दूर रहने का लाइसेंस मानते हैं। हमेशा की तरह महिलाएं जनता के इन सेवकों का आसान निशाना बन जाती हैं। आइए नजर डालते हैं ऎसे कुछ मामलों पर -


1. गोपाल कांडा -गीतिका शर्मा स्केंडल (2012)

हरियाणा के पूर्व मंत्री गोपाल कांडा को एक पूर्व एयरहोस्टेस को आत्महत्या के लिए मजबूर करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। वह अभी जेल में ही है। गीतिका ने दिल्ली स्थित अपने घर में पांच अगस्त 2012 को आत्महत्या कर ली थी। उसने अपने सुसाइड नोट में इसके लिए गोपाल कांडा को जिम्मेदार ठहरया। गोपाल पर गीतिका के साथ अप्राकृतिक सेक्स करने के भी आरोप लगे।


2. अभिषेक मनु सिंघवी सीडी स्केंडल (2012)

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी भी सेक्स स्केंडल में फंसे। एक सीडी सामने आई। यह सीडी सिंघवी के ही पूर्व ड्राइवर ने बनाई थी। इस सीडी में अभिषेक को एक महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया। सिंघवी ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मांग की कि सीडी का प्रसारण रोका जाए लेकिन सीडी यूटयूब पर अपलोड कर दी गई।


3. महिपाल मदेरणा-भंवरी देवी (2011)

राजस्थान की 36 साल की नर्स भंवरी देवी तब सुर्खियों में आई जब उसके पति ने आरोप लगाया कि कांग्रेस के मंत्री महिपाल मदेरणा ने उसकी पत्नी का अपहरण कर लिया है। जांच में पता चला कि भंवरी महिपाल व कांग्रेस विधायक मलखान सिंह को ब्लेकमेल कर रही थी। भंवरी के पास एक सीडी थी जिसमें उसे मदेरणा व अन्य के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया था। आरोप है कि मदेरणा और मलखान ने भंवरी को मरवा दिया। इस मामले में मदेरणा के खिलाफ आरोप तय हो गए हैं।


4. एनडी तिवारी सेक्स स्केंडल (2009)

देश तब सन्न रह गया जब आंध्रप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल एनडी तिवारी के तीन महिलाओं के साथ हमबिस्तर होने वाली तस्वीरें सामने आई। यह एक स्टिंग ऑपरेशन था जिसे एक प्रमुख तेलुगु चैनल ने किया था। तिवारी ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी और अपने पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि उन्होंने दावा किया कि उन्हें फंसाया गया है।


5. अमरमणि त्रिपाठी-मधुमिता शुक्ला सेक्स स्केंडल (2003)

उत्तरप्रदेश की 24 साल की कवयित्री मधुमिता शुक्ला की नौ अप्रेल 2003 को लखनऊ स्थित उसके अपार्टमेंट में दो हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। जांच में सामने आया कि मधुमिता राज्य में मंत्री अमरमणि त्रिपाठी की प्रेमिका थी। यह भी पता चला कि मधुमिता की हत्या अमरमणि की पत्नी मधुमणि के इशारे पर हुई थी। दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया व उम्रकैद की सजा हुई।


6. केरल आईसक्रीम पार्लर सेक्स स्केंडल (1987)


1987 में केरल में हुआ आईस क्रीम सेक्स पार्लर स्केंडल। इस बारे में कोझीकोड के एक एनजीओ ने एफआईआर दर्ज कराई थी। एनजीओ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि आईसक्रीम पार्लर को वेश्यालय के तौर पर चलाया जा रहा है। इतना ही नहीं वहां काम करने वाली लड़कियों को ताकतवर सामाजिक तबके के न्यायिक अधिकारियों व राजनीतिज्ञों सहित अन्य वीआईपीज द्वारा यौन शोषण किया जा रहा है। तब मंत्री रहे पीके मुनहल्लीकुट्टी को जांच घेरे में आने पर इस्तीफा देना पड़ा था।


7. संजय जोशी सेक्स स्केंडल (2005)


भाजपा के तत्कालीन महासचिव संजय जोशी की भी 2005 में एक वीसीडी सामने आई। इसमें संजय को एक महिला के साथ अपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया। संजय जोशी आरएसएस प्रचारक थे और काफी सात्विक माने जाते थे। इसमें जोशी और महिला की आवाज थी तथा महिला कुछ अधूरे वादों के बारे में बात कर रही थी।


8. सुरेश राम सेक्स स्केंडल (1978)


अगर उनका बेटा सेक्स स्केंडल में नहीं फंसता तो जगजीवन राम पहले दलित पीएम बनते। साल 1977 में जनता पार्टी की लहर में इंदिरा गांधी चुनाव हार गई थीं और जगजीवन राम पीएम पद के सबसे बड़े दावेदार माने जा रहे थे। लेकिन दुर्भाग्यवश सूर्या नाम की एक मेग्जीन में तस्वीरें छपीं जिनमें जगजीवन राम के बेटे सुरेश राम को नग्नावस्था में एक महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया। इस मेग्जीन की संपादक मेनका गांधी थीं।


10. हरक सिंह रावत सेक्स स्केंडल (2003)

एक असमिया महिला ने 2003 में आरोप लगाया कि उसके नवजात बच्चे का पिता कांग्रेस के उत्तरांचल में मंत्री हरक सिंह रावत हैं। इस आरोप के बाद रावत ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। रावत उत्तराखण्ड की मौजूदा सरकार में कृषि मंत्री हैं। दो दिन पूर्व इनकी पार्टी में गोलियां चलने की जानकारी सामने आई, जिसमें कांग्रेस के दो नेता घायल हो गए।


11. बॉबी मर्डर केस (1982)

1982 में बिहार बॉबी नामक एक लड़की की हत्या से दहल उठा। बॉबी बिहार सचिवायल में काम करती थी। तत्कालीन कांग्रेस सरकार में शामिल कई मंत्रियों के नाम इसमें सामने आए। काफी दबाव पर लड़की का शव कब्र से निकाला गया और फोरेंसिक जांच की गई। कुछ दोषियों की बाद में पहचान हुई।

12. राघवजी सेक्स स्केंडल (2013)

अपने नौकर के साथ अप्राकृतिक सेक्स करने के आरोप में मध्यप्रदेश के वित्त मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके दो दिन बाद राघवजी को भोपाल में अरेस्ट कर लिया गया। राघवजी (79) को एक फ्लैट से पकड़ा गया। यह फ्लैट बाहर से बंद था, इस पर ताला जड़ा था।



13. अनुराधा बाली-चांद मोहम्मद स्केंडल (2009)


हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भजन लाल के बेटे व हरियाणा के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री चंदर मोहन उर्फ चांद मोहम्मद से शादी करके अनुराधा बाली उर्फ फिजा सुर्खियों में आ गई। दोनों ने इस्लाम अपनाकर शादी की। हरियाणा की असिस्टेंट एडवोकेट जनरल रहीं फिजा ने अगस्त 2012 में आत्महत्या कर ली। चंदर ने अपना घर छोड़ दिया था तथा दोनों फिजा के फ्लैट में रह रहे थे। लेकिन दो माह बाद ही चंदर ने फिजा का साथ छोड़ दिया। वह वापिस अपने परिवार के पास लौट गया। कुछ दिनों बाद चंदर ने फोन पर फिजा को बताया कि वह उसे तलाक दे रहा है।



14. सपा विधायक सेक्स स्केंडल (2013)

सपा विधायक महेंद्र कुमार सिंह को अगस्त में गोवा में पांच अन्य लोगों के साथ गोवा के डांस बार से अरेस्ट किया गया। इन्हें वेश्यावृति निरोधी कानून के तहत अरेस्ट किया गया। सिंह (55) उत्तरप्रदेश में सीतापुर से विधायक है। उसे पंजिम में एक अवैध डांस बार से अरेस्ट किया गया। पुलिस के अनुसार ये लोग अपने साथ लड़कियां लाए थे तथा उन्हीं के साथ होटल में ठहरे थे।

शनिवार, 14 सितंबर 2013

!! चाय की दुकान से पीएम उम्मीदवार तक का सफर !!


नरेंद्र मोदी बचपन में रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे। आज वो भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार हैं। हम आपकों बता रहे हैं नरेंद्र मोदी का चाय की दुकान से पीएम पद के उम्मीदवार तक के सफर की कहानी।

मोदी का जन्म गुजरात के मेहसाना जिले के एक सामान्य परिवार में 17 सितंबर 1950 को हुआ। वे चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर थे। मोदी के पिता दामोदर दास वादनगर रेलवे स्टेशन पर चाय की दुकान लगाते थे। और मोदी चाय की कैटली लेकर रेल यात्रिओं को चाय बेचते थे। उनका घर भी ज्यादा बड़ा नहीं था। उनको जानने वाले कहते हैं कि वो स्कूल में भी एक सामान्य छात्र थे।

जीवनीकार निलंजन मुखोप्धयाय के मुताबिक मोदी की शादी जवानी में ही हो गई थी लेकिन वह शादी ज्यादा दिन तक नहीं चली। और मोदी ने अपनी शादी को एक राज ही बनाकर रखा क्योंकि अगर उनकी शादी की बात सार्वजनिक होती तो वो आरएसएस के प्रचारक नहीं बन सकते थे।

मोदी अक्सर घर से गायब हो जाते थे। कई बार वो हिमालय और अन्य जगहों पर रहते थे। वो कुछ दिन गिर के जंगलों में छोटे से हिंदु मंदिर में भी रहे थे। उन्होंने पूरी तरह से अपना घर 1967 में त्याग दिया था। और 1971 में भारत-पाक के युद्ध के बाद वो आरएसएस के साथ जुड़ गए। उसके बाद वो आरएसएस के दिल्ली ऑफिस पहुंच गए। जहां पर वो सुबह चार बजे उठते थे, ऑफिस की सफाई करते थे, वहां मौजूद वरिष्ठों के लिए चाय और नाश्ता तैयार करते थे। साथ ही दफ्तर में आए पत्रों का भी जवाब देते थे।
वहां पर वो बर्तन साफ करते थे, झाडू निकालते थे और पूरी इमारत में सफाई करते थे। मोदी अपने कपड़े भी खुद ही धोते थे।

जब इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया था और इंदिरा गांधी अपने राजनीतिज्ञ विरोधियों को जेल में डाल रही थी। उसके बाद मोदी फिर दोबारा से गुजरात लौट आए और अंडरग्राउंड हो गए।

मोदी की मेहनत और बेहतर दक्षता ने भाजपा के वरिष्ठों के दिल को जीत लिया। 1987-88 में वो गुजरात भाजपा के साथ जुड़ गए और उन्हें ऑरगेनाइजिंग सेक्रेट्री नियुक्त किया गया। और इस तरह से उन्होंने मैनस्ट्रीम पॉलिटिक्स में एंट्री मारी।

मोदी ने धीरे-धीरे गुजरात भाजपा में अपने पैर जमाकर पूरा कंट्रोल करना शुरू कर दिया। वे कार्यकर्ताओं से नियमित तौर पर मिलने लगे। उन्होंने आडवाणी की सौमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भाजपा का यह ऎसा कदम था जिससे राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की पहचान बनी। जब मुरली मनोहर जोशी पार्टी के अध्यक्ष थे तो उनकी भी कन्याकुमारी से श्रीनगर तक की एकता यात्रा करवाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

लेकिन जैसे-जैसे मोदी राजनीतिक ताकत हासिल करने लगे और अपने हलके में मजबूत होने लगे तो उनके दुश्मनों की संख्या में भी बढ़ोतरी हो गई। 1992 में उन्हें गुजरात भाजपा के वरिष्ठों के द्वारा साइड लाइन कर दिया गया। मोदी के रास्ते में केशूभाई पटेल, शंकरसिंन वागेला और कांशीराम अड़चन बन गए। मोदी ने दूसरे नेताओं के बीच की दरार का फायदे उठाते और उसका इस्तेमाल करते। इस प्रकार वो 2001 में वो पटेल के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री बनए गए।

उसके बाद उनके मुख्यमंत्रीकाल में ही गुजरातदंगे हुए। गुजरात दंगों के लिए आरोपी मोदी को ही ठहराया गया। उन पर आरोप थे कि दंगों को दौरान उन्होंने मुसलमानों के खिलाफ हिंदु उपद्रवियों को भड़काया था। इन दंगों कई हजार लोगों की मौत हो गई थी। इन्ही दंगों की वजह से उनकी मुख्यमंत्री की कुर्सी भी जाती नजर आ रही थी। तत्कालिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था मोदी की इसके लिए जिम्मेदारी है। लेकिन आडवाणी उस वक्त मोदी का बचाव किया था। इसके बाद 2002 में मोदी ने ही पार्टी को ऎतहासिक जीत दिलाई थी। और उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा।

बाद में मोदी विकास और सुशासन का फेस बन गए। मोदी एक हिंदु भक्त हैं जो पिछले चार दशक से नवरात्र के व्रत रख रहे हैं और व्रत के दौरान केवल पानी का सेवन करते हैं।

मुख्य बिंदू-

1987 - बीजेपी में शामिल हुए।

2001- गुजरात में भूकंप आया, जिसमें हजारों लोग मारे गए। तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को पद से हटना पड़ा। पटेल की जगह मोदी को गुजरात की कमान मिली।

2002 - पहली बार मुख्यमंत्री चुनकर आए।

27 फरवरी, 2002 - गुजरात में दंगे भड़के, जिसमें करीब 1000 लोग मारे गए। इनमें अधिकतर मुस्लिम थे। मोदी पर आरोप लगा कि उन्होंने दंगे भड़काए।

2005 - धार्मिक असहनशीलता के कारण अमेरिका ने मोदी को वीजा देने से इनकार कर दिया।

2006 - एक मैगजीन ने मोदी को देश का सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्री बताया।

2007 - दूसरी बार मुख्यमंत्री चुनकर आए।

2012 - मोदी लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री चुनकर आए।

फरवरी, 2012 - 2002 के गुजरात दंगों के मामले में एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट दे दी।

9 जून, 2013 - मोदी को बीजेपी चुनाव प्रचार अभियान समिति की कमान सौंपी गई। 


Note-- श्रोत  पत्रिका डाट काम 

शुक्रवार, 13 सितंबर 2013

! मोहम्मद हाशमी मियां द्वारा इस्लाम एवं शांति का संदेश !


"यह बात बिल्कुल सत्य है कि भारत का कोई भी मुसलमान बाबर की संतान नहीं है। न हम बाबर और अकबर की संतान हैं और न शाहजहां, हुमायूं की। हम संतान हैं, ख्वाजा गरीब नवाज की, फकीरों की, दरवेशों की और सूफी संतों की। उन्होंने हमें आगे बढ़ाया और हमारी आत्मा की शुद्धि की।" यह कहना है प्रसिद्ध इस्लामिक विचारक गाजी-ए-मिल्लत हजरत सैयद शाह मोहम्मद हाशमी मियां का। वे गत दिनों रायपुर (छ.ग.) के शहीद स्मारक भवन में छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद सलीम अशफर् की ओर से आयोजित अल्पसंख्यक विकास सम्मेलन एवं स्वागत समारोह को संबोधित कर रहे थे। मोहम्मद हाशमी मियां अब तक अमरीका, इंग्लैंड, कनाडा, बंगलादेश, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, पाकिस्तान आदि देशों की यात्रा कर इस्लाम एवं शांति का संदेश पहुंचा चुके हैं । सम्मेलन में लगभग एक घंटे तक चले उद्बोधन में उन्होंने आध्यात्मिकता, आतंकवाद, समरसता, हिन्दू-मुस्लिम सौहार्द आदि अनेक महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
मोहम्मद हाशमी मियां ने कहा कि अगर किसी को बाबर की संतान देखने का शौक हो तो वे काबुल जाएं, शायद कुछ बची हुई बाबर की संतानें वहां मिल जाएं। उन्होंने कहा कि भारत में अनेक लोग आए, जहीर-उद-दीन बाबर भी उनमें से एक था। यहां ख्वाजा गरीब नवाज हजरत मोइनुद्दीन चिश्ती भी आए। लेकिन दोनों के आने का उद्देश्य अलग-अलग था। बाबर यहां जमीन के लिए आया, सत्ताधारी बनने के लिए आया, दिल्ली पर कब्जा करने के लिए आया। कुल मिलाकर वह यहां अपना राज्य स्थापित करने के लिए आया। एक शब्द में कहा जाए तो बाबर यहां जमीन के लिए आया। उन्होंने कहा कि बेशक भारत की धरती पर मुसलमान बाहर से आया, वह जमीन के लिए भी आया, लेकिन यह भी सच है कि बाहर से आने वाले मुसलमान दीन (अध्यात्म) के लिए भी भारत आए। जो दीन के लिए यहां आए, वो दीन का प्रतिनिधित्व करेंगे और जो जमीन के लिए आए वो जमीन का। तो जहीर-उद-दीन बाबर जमीन का बच्चा है और ख्वाजा मोइनुद्दीन दीन का बादशाह है। इसलिए हमारी पहचान बाबर नहीं, ख्वाजा गरीब नवाज हैं, उनकी आध्यात्मिक शक्ति और विचारधारा है।
आतंकवाद पर बोलते हुए मोहम्मद हाशमी मियां ने कहा कि आतंकवाद 70 वर्ष से दुनिया के मानचित्र पर दिखाई दे रहा है। 70 साल पहले दुनिया में आतंकवाद नहीं था, स्वतंत्रता संग्राम था। उन्होंने प्रश्न किया कि क्या हिन्दू, इस्लाम, यहूदी, बौद्ध आदि मत-पंथ 70 वर्ष से हैं? इन 70 वर्ष में फैले आतंकवाद के जनक केवल दो ही देश हैं। पहला इजराइल और दूसरा सऊदी अरब। इजराइल बना तो गैर मुस्लिमों में आतंकवाद फैला और सऊदी अरब बना तो आतंकवाद मुस्लिमों में फैल रहा है। आज इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि सऊदी अरब के उदय से पहले दुनिया में आतंकवाद नहीं था। सऊदी अरब बना तो 350 मस्जिदें तोड़ दी गर्इं। 60 हजार से अधिक मजारों को निशाना बनाया गया। यहां तक कि मक्का मदीना में पैगम्बर मोहम्मद की बीबी, बेटी, दामाद, पिता आदि की मजार पर बुलडोजर चला दिया गया। उन्होंने कहा कि इसी देश के कुछ लोगों के धन द्वारा ही पूरे विश्व में वहाबी आंदोलन चलाया जा रहा है। हमें यह समझना चाहिए कि इन लोगों के धन के बल पर जो आंदोलन चलेगा उसका भविष्य कितना खतरनाक होगा। यही आतंकवाद की जड़ है।
सऊदी अरब द्वारा भारत के मुसलमानों को बहकाए जाने के संदर्भ में बोलते हुए मोहम्मद हाशमी मियां ने कहा कि सऊदी अरब ने भारत के मुसलमानों की मजहब के प्रति आस्था को देखकर उनकी तबलीगी जमात बना दी। जो नमाज करते हैं उनसे कहा नमाजी बन जाओ, अजान सीख लो। जो कुछ पढ़े-लिखे हैं, उनके लिए जमात-ए-इस्लामी बना दी। जिनके मन में राजनीतिक इच्छा है, उनके लिए जमीत-उल-अलमा-ए-हिन्द बना दी। उनका हर क्षेत्र में कोई न कोई व्यक्ति है। वे सुन्नी समुदाय के लोगों को चुन-चुनकर अपने कैम्पों में ले जाते हैं और देखते हैं कि कौन-कौन लड़ाकू हैं। उन्हें वे हिजबुल मुजाहिद्दीन, अलकायदा आदि संगठनों में भेज देते हैं। इस तरह जो इन संगठनों में चला जाता है, वह आतंकवादी बन जाता है। परन्तु इनके सम्पर्क में आया हर मुसलमान इन संगठनों में नहीं जाता। उन्होंने आह्वान करते हुए कहा कि क्यों न उस गंदे तालाब को ही घेर लिया जाए, जहां से आतंकवाद की "सप्लाई" है। उन्होंने कहा कि इजराइल हो या सऊदी अरब दोनों अमरीका के हाथ हैं। अपने लड़ाकों के जरिए ही अमरीका ने रूस को हटाया। अब उसे भारत खटक रहा है। उन्होंने कहा कि भारत गरीबों का देश है, लेकिन भारत अमीरों से डरेगा नहीं। अमरीका को पता होना चाहिए कि अमरीका में अमीरों को बचाने के लिए कोई अमीर नवाज नहीं है, लेकिन भारत में गरीबों को बचाने के लिए गरीब नवाज है। भारत की पवित्र धरती पर उनके अपवित्र कदम आ तो सकते हैं, लेकिन ठहर नहीं सकते।
किसी मत-पंथ विशेष को आतंकवाद से जोड़ने के संबंध में बोलते हुए उन्होंने कहा कि आतंकवाद का न तो कोई धर्म होता है और न मजहब, इसलिए आतंकवाद को अगर "हिन्दू आतंकवाद" कहा गया तो मुट्ठीभर आतंकवादी 80 करोड़ हिन्दुओं में गुम हो जाएंगे, मुस्लिम आतंकवाद कहा तो 20 करोड़ में और हिन्दुस्तानी आतंकवाद कहा तो 100 करोड़ में। इसलिए आतंकवादियों को अलग करो, उन्हें चिह्नित करो और इस बात की जांच करो कि आखिर क्या बात है कि जो आतंकवादी दिल्ली, मुम्बई, छत्तीसगढ़, आजमगढ़ आदि में पकड़े जाते हैं, वे अधिकतर एक ही मजहब विशेष के क्यों होते हैं। सरकार को वोट की राजनीति बंद कर उस मजहब का नाम बताना चाहिए। क्योंकि देश की एकता और अखण्डता सर्वोपरि है।
गोहत्या के संबंध में मुसलमानों से अपील करते हुए मोहम्मद हाशमी मियां ने कहा कि खुदा (भगवान) ने सब के सब फल, सब्जियां खाने के लिए जायज ठहराए हैं, लेकिन सब जानवर नहीं। यानी स्वास्थ्य के लिए जो ठीक है, वह सब जायज है। उन्होंने कहा कि जब हमारे हिन्दू भाइयों को गोहत्या से दुख होता है तो हम अपने पड़ोसी के लिए अपना खाना क्यों नहीं बदल सकते। वह खाना खाओ जो तुम्हारा स्वास्थ बढ़ाए, साथ ही पड़ोसी धर्म को भी मजबूती दे।
अयोध्या मंदिर मुद्दे पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे चुनाव करीब आते हैं, मंदिर-मस्जिद का मसला गर्माने लगता है। पता नहीं किन रास्तों से गुजरकर यह इतना जटिल हो गया, किन राजनीति के बखेड़ों में फंसकर यह सुलझने वाला मसला भी उलझने लगा। मस्जिद के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि इस्लाम का मस्जिद के बारे में बड़ा व्यापक दृष्टिकोण है। पूरी दुनिया एक मस्जिद है। यह इसलिए कहा गया कि नमाज छोड़ी न जा सके। मस्जिद किसी ढांचे का नाम नहीं है। मस्जिद सजदा (पूजा-पाठ) की जगह है और सजदा की जगह धरती है। इसलिए धरती ही मस्जिद की जगह है। किसी भी मस्जिद को तब तक मस्जिद नहीं कहा जा सकता, जब तक कि उस जमीन का मालिक उसे मस्जिद बनाने के लिए दान न कर दे। कोई भी समस्या ऐसी नहीं है जो सुलझ न सके। मन की सफाई के साथ बैठेंगे तो हर समस्या का समाधान हो सकता है।
मोहम्मद हाशमी मियां ने कहा कि हिन्दू और मुसलमान में जो क्रोध, घृणा और अंधविश्वास है। उसका कारण अशिक्षा के अंधकार में रहना है। ज्ञान हासिल करना हर मुसलमान-पुरुष और स्त्री का काम है। वो (ईश्वर) तो कहता है कि सबको ज्ञान सिखाओ, वहीं फतवा दिया जा रहा है कि औरतों को घर से मत निकलने दो। लेकिन जिनका सारा उलूम बंद है, उनको कोई बात समझ ही नहीं आती। बहुत ऊंचे स्वर में उन्होंने कहा कि कोई भी बड़े से बड़ा मुफ्ती-मौलाना, कुरान और हदीस का जानकार, दारूल इफ्ता का जानकार, अगर समय की आवश्यकताओं को नहीं समझता तो वह जाहिल है और जाहिल व्यक्ति को कोई भी बात कहने का अधिकार नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर हम अच्छे बन जाएंगे तो हमारा क्या बिगड़ जाएगा। हम खुद अच्छे बनें, अपने परिवार को अच्छा बनाएं। साथ ही अपने पड़ोसी और देश को भी अच्छा बनाएं।
      मोहम्मद हाशमी मियां ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि दुनिया की बड़ी से बड़ी शक्तियां इस बात को ढूंढने में लगी हैं कि सृष्टि में क्या-क्या हमारे लिए है। पहले लोग साधारण और सरल जीवन गुजारते थे। जो जमीन पर मिलता था उसी में ढूंढ लिया कि इसमें मेरे लिए क्या है, लेकिन जैसे-जैसे विज्ञान आगे बढ़ा तो जिज्ञासा भी बढ़ गई कि जमीन के अंदर मेरे लिए क्या-क्या है। वरना पहले जितना तालाब में पानी होता था, उतनी ही जनसंख्या होती थी। मीठी नदी में जितना जल होता था, वो हमारे इस्तेमाल से अधिक होता था। हम जनसंख्या तो बढ़ाते गए लेकिन इस बात का ध्यान नहीं दिया कि जरूरत पूरी हो जाए तो संतोष हो जाना चाहिए। हमारी इच्छाएं बढ़ती गर्इं, आकांक्षाएं बढ़ती गर्इं और हम यह पता लगाने लगे कि जमीन के नीचे क्या-क्या हमारे लिए है । ये वनस्पति, पहाड़, जंगल, फूल, गंगा, यमुना, पशु-पक्षी आदि हमारे लिए हैं । इस पर पूरी किताब लिखते चले जाओ, लेकिन इस बात पर कोई सोचने के लिए तैयार नहीं है कि तुम किसके लिए हो।

बुधवार, 11 सितंबर 2013

18 महीने की अखिलेश सरकार में हुए 28 दंगे क्यों ?

मुजफ्फरनगर में भडकी हिंसा  जिसमे अभी तक 41  से ज्यादा मौते हो चुकी है इन मौतों ने  एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या सपा और सांप्रदायिक दंगों का चोली-दामन का साथ है। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह के लिए यह विडम्बना ही कही जाएगी कि उनक पार्टी के शासन काल में ही उत्तर प्रदेश ने सबसे ज्यादा दंगे देखे है। 
 
यहां तक कि कांग्रेस के नेताओं ने सपा और बसपा के शासनकाल की तुलना कर बसपा को इस मामले में बेहतर बता कर एक नयी सियासी बहस छेड़ दी है।
 
सपा के सत्ता में आते ही वर्ष 2013 से जो सांप्रदायिक हिंसा का तांडव शुरू हुआ है, वह रुकने का नाम नहीं ले रहा है। हर तरफ से आलोचना झेल रहे मुख्यमंत्री के लिए इन दंगों को लेकर जवाब देना मुश्किल हो रहा है। 
 

      मुलायम सिंह को खुद न याद हो कि प्रदेश में हुए दंगों में तीन बार सेना बुलानी पड़ी है और तीनो बार ही प्रदेश की बागडोर सपा के हाथों में थी। 
 
बीती मार्च में विधान सभा के सत्र के दौरान एक सवाल के जवाब में प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव खुद मान चुके हैं कि 15 मार्च 2012 से 31 दिसंबर 2012 के बीच 27 दंगे हुए थे।
 
15 मार्च, 2012 वह तारिख है जब अखिलेश यादव ने प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। खुद प्रदेश के आंकड़ों को देखने तो मार्च 2012 से लेकर अगस्त 2013 तक प्रदेश में कुल 38 दंगे हो चुके हैं यानि कि औसतन हर महीने प्रदेश का कोई न कोई कोना सांप्रदायिक आग में झुलसा है । देखिये दंगो के कुछ नमूने ---
 
मथुरा कोसी कलां 
 
पिछले साल 1 जून, 2012 की दोपहर करीब दो बजे मथुरा के कोसीकलां में सराय शाही इलाके में पीने के पानी वाले ड्रम में एक संप्रदाय के युवक द्वारा हाथ डालने को लेकर जो विवाद हुआ वह ने देखते ही देखते साम्प्रदायिक दंगे में बदल गया। इस घटना में चार लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी और दर्जनों घायल हुए। सांप्रदायिक उन्माद में भीड़ ने ने दर्जनों वाहनों और दुकानों में आग लगा दी। हिंसा रोकने के लिए जब वहां पुलिस बल पहुंचा तो भीड़ ने उस पर भी भारी पथराव और फायरिंग कर दी। इस घटना पर विधानसभा में सरकार की किरकिरी के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस घटना में जिला प्रशासन के ढीले-ढाले रवैये से काफी नाराज दिखे।
 
आस्थान, प्रतापगढ़
 
मथुरा के कोसीकलां दंगों के तीन हफ्ते बाद 23 जून 2012 को प्रतापगढ़ के आस्थान गांव में दलित लड़की दुष्कर्म और हत्या की घटना से गुस्साई भीड़ ने गांव के दुष्कर्म के आरोपी व्यक्तियों सहित गांव के करीब 46 मकानों को आग लगा दी। रात भर चले इस हिंसक तांडव के शिकार लोगों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने इस मामले में कुछ भी नहीं किया। इस मामले में दो एफआईआर दर्ज की गई और 68 लोगों के नाम सामने आए, लेकिन इनके खिलाफ गिरफतारी की कार्रवाई भी नहीं हुयी।
  
बरेली
 
इस ठीक एक महीने बाद ही 23 जुलाई को बरेली में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे। यह हिंसा कांवरियों और चाय की दुकान वालों के बीच विवाद के बाद भडकी। इस विवाद ने धीरे-धीरे साम्प्रदायिक दंगे का रूप ले लिया और पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया। यहाँ तीन जिंदगियां इस हिंसा की भेंट चढ़ गयीं। इसके बाद शहर के कई इलाकों में बेमियादी कर्फ्यू लगाना पड़ा।अभी 11 अगस्त को बरेली में कर्फ्यू हटाया ही गया था कि चार दिन बाद ही यहां फि‍र दो समुदाय आपस में भिड़ गए। जमकर पत्थर बाजी हुई और गोलियां चलीं। प्रशासन को दोबारा कर्फ्यू लगाना पड़ा। इन दोनों दंगों में पुलिस ने कुल 38 एफआईआर दर्ज की ओर 293 लोगों को गिरफ्तार किया।
 
लखनऊ-इलाहाबाद 
 
17 अगस्त को असम में हुई हिंसा का हवाला देकर अलविदा की नमाज के बाद कुछ अराजकतत्वों ने लखनऊ शहर में जमकर उत्पात मचाया। पुलिस के सामने उपद्रवियों ने राजधानी की सड़कों पर जमकर बवाल काटा। दुकानें लूटी गईं, पुलिस की बाइक फूंक दी गयी, कई वाहनों में तोडफ़ोड़ की और राहगीरों से अभद्रता की। कवरेज कर रहे मीडियाकमिर्यों को भी जमकर पीटा गया। बाद में मीडियाकमिर्यों ने उत्पीडऩ के विरोध में हजरतगंज चौराहे पर जाम लगा दिया। प्रमुख सचिव गृह ने कड़ी कार्रवाई करने का आश्वासन देकर मीडिया को शांत कराया।इसी दिन असम में हुई हिंसा का हवाला देकर अलविदा की नमाज के बाद इलाहाबाद में करीब 5000 लोगों की भीड़ ने करीब 200 गाड़ियों को तोड़ डाला और दुकानें लूट लीं। इस हिंसा के बाद प्रशासन को इलाहाबाद में कर्फ्यू लगाना पड़ा।
 
गाजियाबाद 
 
फि‍र 14 सितम्‍बर को गाजियाबाद में किसी शरारती तत्व ने एक धार्मिक ग्रन्थ के पन्ने पर अपशब्द लिखकर मसूरी के आध्यात्मिक नगर रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया। इससे लोग भड़क उठे। आक्रोशित लोगों ने मसूरी थाने में घुसकर पुलिसकर्मियों से हाथापाई की और वहां खड़े वाहनों को फूंक डाला। करीब 50 वाहन क्षतिग्रस्त हुए। खुद सीएम अखिलेश यादव ने कहा की प्रदेश का पुलिस महकमा बहुत बिगड़ा हुआ है, इसे सुधारने में वक्त लगेगा।इसे सुधारने में वक्त लगेगा। उन्होंने ने माना की पुलिस में काफी समय से प्रमोशन ना होने से असंतोष है। जल्दी ही प्रमोशन किये जाएंगे। अखिलेश ने कहा की मृतकों के परिवार को पांच-पांच लाख रूपये की सहायता और घायलों को एक- एक लाख रुपये दिए जायेंगे।
  
फैजाबाद 
 
इसके अगले ही महीने 24 अक्टूबर को फैजाबाद में मूर्ति विसर्जन के दौरान हुई मारपीट ने साम्प्रदायिक रंग ले लिया और देखते ही देखते गुस्साई भीड़ ने पुलिस की कई गाड़ियों और दर्जनों दुकानों में आग लगा दी। चौक और भदरसा में हुयी हिंसक वारदतों के चलते कई दिनों तक फैजाबाद में कर्फ्यू लगाना पड़ा तब जाकर माहौल शांत हुआ। आज भी इन दंगों का दर्द वहां देखा जा सकता है।
 
अम्‍बेडकरनगर
 
इसके बाद अम्‍बेडकरनगर के टांडा में हिंदू युवा वाहिनी के  नेता रामबाबू गुप्ता की हत्‍या कर दी गई, जिसके बाद पूरा टांडा साम्‍प्रदायिक दंगे की आग में जल उठा। यहाँ पांच दिनों तक कर्फ्यू लगाना पड़ा , तब कहीं जाकर प्रशासन शांति बना पाया।
 
2013 में हुए हिंसक और सांप्रदायिक बवाल 
 
26 जुलाई को मुरठ के नंगलामल मंदिर में लाउडस्पीकर बजाने को लेकर दो समुदायों में झड़प।
31 जुलाई को मेरठ में रमजान का जुलूस के दौरान पथराव।
3 अगस्त को एटा के अम्मापुर कस्बे में छात्राओं से छेड़छाड़ के विरोध में मारपीट के बाद बवाल।
  
6 अगस्त को रामपुर के बहादुरगंज में भी नमाज के दौरान लाउडस्पीकर बजाने को लेकर बवाल।
9 अगस्त को अमरोहा में ईद की नमाज पढ़ने जा रहे युवकों द्वारा हिंसा और तोड़फोड़।
9 अगस्त को ही मेरठ के जानी थाना क्षेत्र के रसूलपुर धौलड़ी गांव में सोशल मीडिया पर इस्लाम पर टिप्पणी को लेकर लोग सड़कों पर उतर पड़े।
 
 
12 अगस्त को जौनपुर के मछलीशहर में कुत्ते की मौत ने सांप्रदायिक बवाल का रूप ले लिया।
16 अगस्त को बुलंदशहर में एक युवती के साथ सामुहिक बलात्कार के बाद सांप्रदायिक उन्माद और गोलीबारी।
22 अगस्त को अलीगढ़ के खैर में लड़की भगाने के मामले में जाट समाज ने 450 मुस्लिम परिवारों का बहिष्कार किया जिसके चलते स्थिति तनावपूर्ण हो गयी।
 
25 अगस्त को झांसी में सांप्रदायिक तनाव।
27 अगस्त को कन्नौज के बैंक ऑफ इंडिया में खाता खुलवानें को लेकर बवाल।
27 अगस्त को कवाल में सांप्रदायिक तनाव में तीन युवकों की हत्या के बाद शुरू हुआ बवाल।
 
1 सितंबर को सुल्तानपुर के देहली मुबारकपुर में दलित की हत्या और दलित बस्ती जलाने पर बवाल।
 

 18 महीने की अखिलेश सरकार में हुए 28 दंगे क्यों ? 
 
क्योकि अखिलेश हो या मुलायम इनकी पार्टी सपा (दंगा पार्टी ,गुंडा पार्टी ) जब भी शासन में  आती है मुस्लिमो को संरक्षण देती है । टीक है देना भी चाहिए संक्षरण क्योकि मुस्लिमो में बहुत बड़ा तबका गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहा पर मुस्लिमो का दुर्भाग्य ही कहुगा की ये लोग इस संरक्षण का फायदा अपने विकास के लिए नहीं उठा पाते बल्कि समाज में गुंडागर्दी और अपनी धौस जमाने के लिए उपयोग करते है परिणाम क्या निकलता है ऊपर स्पस्ट है । मैं तो इस देश के खासकर उत्तरप्रदेश के मुस्लिम भाइयो से निवेदन करुगा की देश के और स्वेम के विकास के लिए संरक्षण का फायदा उठाये । नहीं तो मुलायम और अखलेश जैसे आपके इस लड़ाकूपन  का फायदा उठाते रहेगे क्योकि मुसलमानों की अशिक्षा , अज्ञानता और गरीबी का फायदा  छद्म सेकुलर पार्टिया ६६ साल से उठाती आ रही है और आगे भी उठायेगी मुस्लिम भाइयो अभी  भी वक्त है आप सम्हल जाये नहीं तो आपका विकास नहीं होगा , हा विनास की ओर  जरुर बढ़ रहे है आप लोग जैसे  ईराक ,अफगानिस्तान ,पकिस्तान ,सीरिया आदि  कितने नाम गिनाऊ  ? 

सोमवार, 9 सितंबर 2013

नरेन्द्र मोदी के हाथ में जादुई चिराग है ?


 मैं फेस बुक में कई महीनो से देख रहा हु ,पढ़ रहा हु , मेरे मित्रो के मुह से सुन भी रहा हु की नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन जायेगे तो" ये " कर देगे "ओ" कर  देगे (ये ,ओ, क्या है मत पूछिये अपनी - अपनी समझ है ) पर मैं एक बात खरी खरी कह रहा हु की नरेन्द्र मोदी के हाथ में कोई जादुई चिराग नहीं है , बल्कि जादुई चिराग तो आप सभी के हाथो में है
                  आज लगभग ९ सालो से कांग्रेश का शासन है और हम इस शासन को  हम  सरकार को बहुत कोसते हैं । क्या उस सरकार में हमारी कोई हिस्सेदारी नहीं है ? अगर नहीं है, तो हम उस सरकार के विरोधी हुए… विरोध की भाषा जरूरी नहीं कि वो देश की भाषा भी हो… तो कोई भी आंदोलन का राष्ट्रीय स्वरूप क्या होगा ? जहां सारे विरोधी एक स्वर में बोलें और सरकारी कर्मचारियों की हिस्सेदारी (गुप्त) हो… मूलत: सरकारी गैर-सरकारी कर्मचारी ही देश की आम जनता है और अभी तक वो किसी भी आंदोलन से दूर है । क्यों ?

हम आंदोलन इसलिए करते हैं कि बेहतर व्यवस्था हो सके, पर सरकार व्यवस्था नहीं बदलती वो सिर्फ नीतियों को बनाने और लागू करने का आदेश देती है । अब फिर व्यवस्था घूम-फिर कर हमारे पास आ गयी, तो, अभी की सरकार की व्यवस्था तो अभी भी हमारे पास ही है… तो हम उसका इस्तेमाल क्यूं नहीं करते ? ये तो अब खुद सोचना पड़ेगा कि व्यवस्था है क्या और इसका इस्तेमाल कैसे करें । व्यवस्था का हम सही इस्तेमाल शायद इसलिए नहीं कर पाते क्यूंकि हमारे लिए “देश” तो है, पर “कैसा”  देश हो ये बिल्कुल स्पष्ट नहीं है… ये बिलकुल वैसा है जैसे “अंधों का हाथी”।

चार क्षेत्र हैं । दक्षिण कहता है मुझे कमजोर न समझना, तो पूर्व कहता है मैं तुम्हारी वाट लगा दूंगा, पश्चिम कहता है मुझे तो कोई पसंद ही नहीं, तो उत्तर कहता है कोई बात नहीं मुझे तो राज करना है, जिसे आना है आओ… और सारी बातों का “उत्तर” दिये बगैर उत्तर चुप रहता है । वो जानता है कि उसे सिर्फ सरकार चलानी है… देश नहीं बदलना है, न ही वो बदल सकते हैं । क्‍योंकि देश सिर्फ जनता बदल सकती है अपने कर्तब्य परायण ,इमानदारी से  (जैसे सरकारें देश नहीं बदल सकती, वैसे ही, राजनीतिक आंदोलन सिर्फ सरकारें बदल सकते हैं, देश नहीं) । तो देश की जनता कौन है और?  कहां है…?  दक्षिण, पूरब, पश्चिम, उत्तर, हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, अगड़ी जाति, पिछड़ी जाति, अति-पिछड़ी जाति… कहां तक जाएं ? टुकड़ों में बंटी जनता को, देश नही, सुख चाहिए  अपने देश में सुख की कल्पना गलत तो नहीं है, ये अधिकार है हमारा ।

 पर हमारा “कर्तव्य” ?

हमारा कर्तव्य, दूसरे के अधिकार की पूर्ति करता है । तो  कर्तव्य करो इमानदारी से अधिकार अपने आप मिल जायेगे ,देश का विकास  हो जाएगा ।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

सुक्रिया सेकुलर मीडिया ?

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है, ऐसा संविधान में लिखा है ! हर मज़हब के लोगों को अपने रीति-रिवाजों के मुताबिक जीने का हक़ है ! संविधान की धारा 19 (a) के तहत अभिव्यक्ति का अधिकार है! हाल-फिलहाल, आसाराम के केस में, मीडिया ने अभिव्यक्ति की "आज़ादी" को खूब "कैश" भी कराया! हालांकि मीडिया ने अति कर दी पर यकीनन शाबाशी मिलने की भी हक़दार है! क्योंकि आसाराम जैसे पाखंडियों पर लगाम ज़रूरी है! लेकिन इन आसाराम जैसों की वज़ह से बद भी बदनाम होने लगें तो? एकतरफा "सेक्युलर" मीडिया ने एक सवाल आमजनमानस के मन में पैदा कर दिया है कि क्या हिन्दू धर्म वास्तव में इतना या सबसे खराब है ?

क्या सारे "कुकर्मी" इसी धर्म में मौजूद हैं ? क्या हिन्दू धर्म से जुडी आस्था बकवास है ? क्या हिन्दू धर्म से जुड़े गुरू और बाबा "ढोंगी" हैं ? ये सारे सवाल इसलिए क्योंकि टीवी देखने वाले दर्शकों का एक बड़ा हिस्सा, शायद ही ये बताने में कामयाब हो कि किसी और धर्म के "पापी आसारामी" टाइप नुमाइंदों को, मीडिया इतने व्यापक स्तर पर कब उठाया ?

किस धर्म के आसारामी टाइप पाखंडी गुरू के यौन-शक्ति को तौला गया ? किस धर्म के पाखंडी बाबाओं की रासलीला का बेशर्म प्रसारण न्यूज़ चैनलों पर लगातार, एक मुहिम के तहत, होता रहा? कानून और आरोपी के बीच मीडिया की सक्रियता का राज़ क्या है? गर मीडिया, देश के साथ है तो ज़ाकिर और ओवैसी जैसे कई "गुरुओं" के भाषणों के खिलाफ मुहिम चलाता! आतंक की सरपरस्ती करने वाले इस देश के गद्दारों के खिलाफ "युद्ध" छेड़ देता! मीडिया गर संवेदनशील है और आम आदमी का हाथ है तो कालाहांडी और बस्तर दुर्दशा के ज़िम्मेदार नालायक लोगों को खोजने के लिए भी मुहिम चलाता! मीडिया गर वॉच-डॉग की भूमिका में है तो सूदूर के प्रान्तों में मासूमों के साथ हो रही ज़्यादती के खिलाफ़ मुहिम चलाता! कोयला घोटाले जैसे हज़ारों-करोड़ के घोटाले को लेकर सरकार और विपक्ष का बाहर निकलना मुश्किल कर देता! इस देश के आम आदमी का पैसा लूट कर अपनी तिजोरी भरने वालों को आसाराम की तरह, जेल में जाने के लिए विवश कर देता! पर हकीक़त में न्यूज़ चैनल्स ने किया क्या?

कुकर्मी आसाराम की यौन क्षमता न्यूज़ चैनल्स की टीआरपी बढाने का हथियार बन गयी ? पाखंडी आसाराम की रासलीला, न्यूज़ चैनल्स की ज़रुरत बन गयी ? मतलब न्यूज़ चैनल अब इस स्तर पर आ चुके हैं कि किसी कुकर्मी की यौन क्षमता से अपनी क्षमता बढायें ? हद तो तब हो गयी जब पुण्य-प्रसून वाजपेयी जैसे ज़िम्मेदार पत्रकार, अपनी (माफ़ कीजियेगा) अपने चैनल ("आज तक") की क्षमता बढाने के लिए सेक्सोलौजिस्ट प्रकाश कोठारी को पकड़ कर ले आये ! पर बात यहीं तक सीमित नहीं है। सबसे अहम् मुद्दा ये रहा कि किसी एक धर्म के कुकर्मी प्रतिनिधियों पर ही मीडिया ने इतना बवंडर क्यों किया? पिछले एक दशक गवाही के लिए काफी हैं कि तथा-कथित टी.वी. न्यूज़ चैनल्स ने (हिन्दू) धर्म-विशेष के पाखंडियों पर ही विलाप किया? क्या ये सब प्रायोजित है एफडीआई की तरह? क्या कुछ विदेशी ताक़तों और न्यूज़ चैनल्स के बीच में कुछ अदृश्य गठजोड़ है? ग़र ऐसा है तो मामला संगीन है! इसकी जांच होनी चाहिए!

न्यूज़ चैनल्स को ये स्पष्टीकरण देना पडेगा कि आसाराम की तरह और जिन पाखंडियों के खिलाफ न्यूज़ चैनल्स ने, अब तक मुहिम छेड़ी है उनमें से कितने प्रतिशत टाइम किन-किन पाखंडियों को दिया गया और इनमें से कितने किस धर्म के थे? सेक्युलर देश मे ख़बरों का सेक्युलर प्रसारण हो तो लोकतंत्र को मज़बूती मिलती है, मगर जब नज़रिया दो-आँखों का हो तो सवाल उतना लाज़िमी है! अपराधी-आतंकी-कुकर्मी-वव्यभाचारी-भ्रष्ट के खिलाफ मुहिम का समर्थन, हर ईमानदार और नेक इंसान करेगा मगर जब सिख-दंगे, गुजरात और गोधरा जैसे वाकये होंगे तो एक वर्ग विशेष चीखेगा चिल्लाएगा! इन्साफ की मांग करेगा! लेकिन मीडिया को हर उस हरक़त पर चीखना और चिल्लाना आना चाहिए जो आम-आदमी के हितों की रक्षा ना करती हो।

मीडिया का चरित्र, साम्प्रदायिक ना हो। ख़बरों के प्रसारण में संतुलन बना रहे। किसी की सेक्स-पावर मीडिया की पावर ना बने। इस बात का ख़याल मीडिया को रखना चाहिए, जो न्यूज़ चैनल्स ने नहीं रखा। न्यूज़ चैनल के पास प्रसारण का लाइसेंस है। स्वनिय्मन का क़ानून भी है। मगर इसका मतलब ये नहीं कि ख़बरों के ज़रिये महज़ एक धर्म-विशेष के खिलाफ मुहिम का वातावरण बना दें! अपराधी को सज़ा कानून देगा। कानून और अपराधी के बीच मीडिया का अति-उत्साह शाबाशी का हक़दार है... लेकिन इस अति-उत्साह के आलम को एक धर्म-विशेष के खिलाफ हथियार के तौर पर इस्तेमाल से बाज़ आना चाहिए ! आसाराम जैसे पाखंडी और कुकर्मी हर मज़हब और जाति में है! कुकर्मी तो कुकर्मी होता है चाहे वो किसी भी मज़हब और जाति का हो तो फिर धर्म-विशेष के आधार पर आरक्षण क्यों?

पर ये सवाल अभी तक ना तो दर्शकों ने "अपने" प्रिय न्यूज़ चैनल्स से पूछा और ना ही न्यूज़ चैनल्स ने धर्मनिरपेक्षता दिखलाई! माना जा रहा है कि कट्टरपंथियों का डर, चैनल वाले जानते हैं ! लातों के भूत-बातों से नहीं मानते...ऐसा स्वर्गीय बाल ठाकरे समझाते थे....आज राज ठाकरे समझा रहे हैं! आज के दौर में खौफ़ और पैसा, यही दो ऐसे पहलू हैं, जो चैनल्स चलाने वाले इंसान को खरीद लेते हैं, चैनल क्या चीज़ है! शायद यही कारण है, न्यूज़ चैनल्स के "एकतरफा धर्मनिरपेक्ष" होने का! कुकर्मी आसाराम जैसों को भेजवाने के लिए शुक्रिया, "सेकुलर" मीडिया! आप लोगों ने पुख्ता कर दिया कि वाकई हिन्दू धर्म बहुत "खराब" है !



साभार --बिस्फोट डाट काम !

गुरुवार, 5 सितंबर 2013

। गुरु (शिक्षक ) एक परिवर्तनकारी बल है ।

शिक्षक दिवस पर आप सभी को बहुत बहुत शुभ कामनाये ।

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरूर देवो महेश्वराय ।
गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै ‍श्री गुरुवे नम: ।।

----गुरू को साक्षात परब्रह्म की संज्ञा दी गई है----

गुरु एक परिवर्तनकारी बल है । जहाँ गुरु की कृपा है, वहाँ विजय है । गुरु-शिष्य का संबंध तर्क के बजाय आस्था, श्रद्धा और भक्ति पर केंद्रित होता है। भावना का उफान या उत्तेजना गुरु भक्ति नहीं है। भक्ति का आशय समर्पण है। शिष्य का गुरु के प्रति जितना समर्पण होगा, उतना ही गुरु-शिष्य का संबंध प्रगाढ़ होगा। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह गुरु का चयन करते समय तर्क-वितर्क, सत्य-असत्य जैसे तमाम पहलुओं को अच्छी तरह परखे। मन में कोई संशय बाकी नहीं रहना चाहिए, क्योंकि समर्पण के अभाव कें गुरु भक्ति निरर्थक है ।

जहा तक मेरा सोचना है की दुःख ही सबसे बड़ा शिक्षक है दुखों की पाठशाला में पढ़ा-लिखा और पका व्यक्ति अनायास ही सर्वश्रेष्ठ बन जाता है । मनुष्य जितना सुविधाओं और सुख-साधनों में रहकर नहीं सीखता उससे अधिक कठिनाइयां और अभाव ही उसे तराशती और मांजती और सुयोग्य बनाती हैं। सबक यह कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों या मुसीबतों को तप या व्यायाम समझकर सदा हंसकर सामना करना चाहिये। ऐसा करने से व्यक्ति बेहद शक्तिशाली और अजैय यौद्धा बन जाता है। सुख नहीं दु:ख ही हमारा सबसे बड़ा शिक्षक है ।

इस दुःख और संघर्ष का जीता जागता उदाहरण मैं (नागेश्वर सिंह बाघेल) स्वयं हु