मंगलवार, 1 अगस्त 2017

धारा 370 की जननी अनुच्छेद 35A

धारा 370 की जननी अनुच्छेद 35A : संविधान का व अदृश्य हिस्सा जिसने कश्मीर को लाखों लोगों के लिए नर्क बना दिया है ! आगे पढ़िए क्या है यह ?
जून 1975 में लगे आपातकाल को भारतीय गणतंत्र का सबसे बुरा दौर माना जाता है. इस दौरान नागरिक अधिकारों को ही नहीं बल्कि भारतीय न्यायपालिका और संविधान तक को राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ा दिया गया था. ऐसे कई संशोधन इस दौर में किये गए जिन्हें आज तक संविधान के साथ हुए सबसे बड़े खिलवाड़ के रूप में देखा जाता है. लेकिन क्या इस आपातकाल से लगभग बीस साल पहले भी संविधान के साथ ऐसा ही एक खिलवाड़ हुआ था? 'जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र' की मानें तो 1954 में एक ऐसा 'संवैधानिक धोखा' किया गया था जिसकी कीमत आज तक लाखों लोगों को चुकानी पड़ रही है.

1947 में हुए बंटवारे के दौरान लाखों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए थे. ये लोग देश के कई हिस्सों में बसे और आज उन्हीं का एक हिस्सा बन चुके हैं. दिल्ली, मुंबई, सूरत या जहां कहीं भी ये लोग बसे, आज वहीं के स्थायी निवासी कहलाने लगे हैं. लेकिन जम्मू-कश्मीर में स्थिति ऐसी नहीं है. यहां आज भी कई दशक पहले बसे लोगों की चौथी-पांचवी पीढ़ी शरणार्थी ही कहलाती है और तमाम मौलिक अधिकारों से वंचित है.

एक आंकड़े के अनुसार, 1947 में 5764 परिवार पश्चिमी पकिस्तान से आकर जम्मू में बसे थे. इन हिंदू परिवारों में लगभग 80 प्रतिशत दलित थे. यशपाल भारती भी ऐसे ही एक परिवार से हैं. वे बताते हैं, 'हमारे दादा बंटवारे के दौरान यहां आए थे. आज हमारी चौथी पीढी यहां रह रही है. आज भी हमें न तो यहां होने वाले चुनावों में वोट डालने का अधिकार है, न सरकारी नौकरी पाने का और न ही सरकारी कॉलेजों में दाखिले का.'

यह स्थिति सिर्फ पश्चिमी पकिस्तान से आए इन हजारों परिवारों की ही नहीं बल्कि लाखों अन्य लोगों की भी है. इनमें गोरखा समुदाय के वे लोग भी शामिल हैं जो बीते कई सालों से जम्मू-कश्मीर में रह तो रहे हैं. इनसे भी बुरी स्थिति वाल्मीकि समुदाय के उन लोगों की है जो 1957 में यहां आकर बस गए थे. उस समय इस समुदाय के करीब 200 परिवारों को पंजाब से जम्मू कश्मीर बुलाया गया था. कैबिनेट के एक फैसले के अनुसार इन्हें विशेष तौर से सफाई कर्मचारी के तौर पर नियुक्त करने के लिए यहां लाया गया था. बीते 60 सालों से ये लोग यहां सफाई का काम कर रहे हैं. लेकिन इन्हें आज भी जम्मू-कश्मीर का स्थायी निवासी नहीं माना जाता.

ऐसे ही एक वाल्मीकि परिवार के सदस्य मंगत राम बताते हैं, 'हमारे बच्चों को सरकारी व्यावसायिक संस्थानों में दाखिला नहीं दिया जाता. किसी तरह अगर कोई बच्चा किसी निजी संस्थान या बाहर से पढ़ भी जाए तो यहां उन्हें सिर्फ सफाई कर्मचारी की ही नौकरी मिल सकती है.'

यशपाल भारती और मंगत राम जैसे जम्मू कश्मीर में रहने वाले लाखों लोग भारत के नागरिक तो हैं लेकिन जम्मू-कश्मीर राज्य इन्हें अपना नागरिक नहीं मानता. इसलिए ये लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं. 'ये लोग भारत के प्रधानमंत्री तो बन सकते हैं लेकिन जिस राज्य में ये कई सालों से रह रहे हैं वहां के ग्राम प्रधान भी नहीं बन सकते.' सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता जगदीप धनकड़ बताते हैं, 'इनकी यह स्थिति एक संवैधानिक धोखे के कारण हुई है.'

ये लोग लोकसभा के चुनावों में तो वोट डाल सकते हैं लेकिन जम्मू कश्मीर में पंचायत से लेकर विधान सभा तक किसी भी चुनाव में इन्हें वोट डालने का अधिकार नहीं

जगदीप धनकड़ उसी 'संवैधानिक धोखे' की बात कर रहे हैं जिसका जिक्र इस लेख की शुरुआत में किया गया था. जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र के निदेशक आशुतोष भटनागर बताते हैं, '14 मई 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा एक आदेश पारित किया गया था. इस आदेश के जरिये भारत के संविधान में एक नया अनुच्छेद 35A जोड़ दिया गया. यही आज लाखों लोगों के लिए अभिशाप बन चुका है.'

'अनुच्छेद 35A जम्मू-कश्मीर की विधान सभा को यह अधिकार देता है कि वह 'स्थायी नागरिक' की परिभाषा तय कर सके और उन्हें चिन्हित कर विभिन्न विशेषाधिकार भी दे सके.' आशुतोष भटनागर के मुताबिक 'यही अनुच्छेद परोक्ष रूप से जम्मू और कश्मीर की विधान सभा को, लाखों लोगों को शरणार्थी मानकर हाशिये पर धकेल देने का अधिकार भी दे देता है.'

आशुतोष भटनागर जिस अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) का जिक्र करते हैं, वह संविधान की किसी भी किताब में नहीं मिलता. हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं है. जगदीप धनकड़ बताते हैं, 'भारतीय संविधान में आज तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सबका जिक्र संविधान की किताबों में होता है. लेकिन 35A कहीं भी नज़र नहीं आता. दरअसल इसे संविधान के मुख्य भाग में नहीं बल्कि परिशिष्ट (अपेंडिक्स) में शामिल किया गया है. यह चालाकी इसलिए की गई ताकि लोगों को इसकी कम से कम जानकारी हो.' वे आगे बताते हैं, 'मुझसे जब किसी ने पहली बार अनुच्छेद 35A के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि ऐसा कोई अनुच्छेद भारतीय संविधान में मौजूद ही नहीं है. कई साल की वकालत के बावजूद भी मुझे इसकी जानकारी नहीं थी.'

भारतीय संविधान की बहुचर्चित धारा 370 जम्मू-कश्मीर को कुछ विशेष अधिकार देती है. 1954 के जिस आदेश से अनुच्छेद 35A को संविधान में जोड़ा गया था, वह आदेश भी अनुच्छेद 370 की उपधारा (1) के अंतर्गत ही राष्ट्रपति द्वारा पारित किया गया था. लेकिन आशुतोष कहते हैं, 'भारतीय संविधान में एक नया अनुच्छेद जोड़ देना सीधे-सीधे संविधान को संशोधित करना है. यह अधिकार सिर्फ भारतीय संसद को है. इसलिए 1954 का राष्ट्रपति का आदेश पूरी तरह से असंवैधानिक है.'

अनुच्छेद 35A (कैपिटल ए) संविधान की किसी किताब में नहीं मिलता. हालांकि संविधान में अनुच्छेद 35a (स्मॉल ए) जरूर है, लेकिन इसका जम्मू-कश्मीर से कोई सीधा संबंध नहीं

अनुच्छेद 35A की संवैधानिक स्थिति क्या है? यह अनुच्छेद भारतीय संविधान का हिस्सा है या नहीं? क्या राष्ट्रपति के एक आदेश से इस अनुच्छेद को संविधान में जोड़ देना अनुच्छेद 370 का दुरूपयोग करना है? इन तमाम सवालों के जवाब तलाशने के लिए जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र जल्द ही अनुच्छेद 35A को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने की बात कर रहा है.

वैसे अनुच्छेद 35A से जुड़े कुछ सवाल और भी हैं. यदि अनुच्छेद 35A असंवैधानिक है तो सर्वोच्च न्यायालय ने 1954 के बाद से आज तक कभी भी इसे असंवैधानिक घोषित क्यों नहीं किया? यदि यह भी मान लिया जाए कि 1954 में नेहरु सरकार ने राजनीतिक कारणों से इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल किया था तो फिर किसी भी गैर-कांग्रेसी सरकार ने इसे समाप्त क्यों नहीं किया? इसके जवाब में इस मामले को उठाने वाले लोग मानते हैं कि ज्यादातर सरकारों को इसके बारे में पता ही नहीं था शायद इसलिए ऐसा नहीं किया गया होगा.

अनुच्छेद 35A की सही-सही जानकारी आज कई दिग्गज अधिवक्ताओं को भी नहीं है. जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र की याचिका के बाद इसकी स्थिति शायद कुछ ज्यादा साफ़ हो सके. लेकिन यशपाल भारती और मंगत राम जैसे लाखों लोगों की स्थिति तो आज भी सबके सामने है. पिछले कई सालों से इन्हें इनके अधिकारों से वंचित रखा गया है. यशपाल कहते हैं, 'कश्मीर में अलगाववादियों को भी हमसे ज्यादा अधिकार मिले हुए हैं, वहां फौज द्वारा आतंकवादियों को मारने पर भी मानवाधिकार हनन की बातें उठने लगती हैं. वहीं हम जैसे लाखों लोगों के मानवाधिकारों का हनन पिछले कई दशकों से हो रहा है. लेकिन देश को या तो इसकी जानकारी ही नहीं है या सबकुछ जानकर भी हमारे अधिकारों की बात कोई नहीं करता.'

आशुतोष भटनागर कहते हैं, 'अनुच्छेद 35A दरअसल अनुच्छेद 370 से ही जुड़ा है. और अनुच्छेद 370 एक ऐसा विषय है जिससे न्यायालय तक बचने की कोशिश करता है. यही कारण है कि इस पर आज तक स्थिति साफ़ नहीं हो सकी है.' अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर को कुछ विशेषाधिकार देता है. लेकिन कुछ लोगों को विशेषाधिकार देने वाला यह अनुच्छेद क्या कुछ अन्य लोगों के मानवाधिकार तक छीन रहा है? यशपाल भारती और मंगत राम जैसे लाखों लोगों की स्थिति तो यही बताती है.
Copy
सुप्रभात मित्रो..... जय जय श्री राम .....

शनिवार, 8 जुलाई 2017

राजा पुरु (पोरस) और सिकंदर

"सिकंदर में तुम्हे आखिरी मौका देता हूँ, आओ हम दोनों अकेले युद्ध करते है, अगर में हार गया तो मेरा सारा राज्य तुम्हारा, ओर तुम हार गए तो भारत भूमि की तरफ तुम आंख उठाकर नही देखोगे , क्यो की अगर मेरी सेना को मैने युद्ध के आदेश दे दिए, तो तुम्हारा महानाश निश्चित है । " --राजा पोरस
लेकिन विनाशकाले विपरीत बुद्धि, इस बूढ़े राजा के द्वंद को स्वीकार करने की हिम्मत भी युवा सिकंदर में ना हुई । और अपना महानाश करवा बैठा ।। सिन्धु नदी के इस पर तो वापस आ गया किन्तु दुबारा वापस लौट नही पाया ।।
आइए जानते है अब पूरी घटना ---
भारत पर आक्रमण करने वाले आक्रमणकारी हमेशा ही लड़खड़ाते हुए ही वापस दौड़े, एक दुःसाहस भारत पर आक्रमण करने का सिकंदर ने भी कर दिया , उसने भारत की सीमाओं के साथ छेड़खानी की , ओर जीवन का सबसे कटुतम स्वाद चखा, ओर दुर्गति होने के कारण वो अपने प्राण ही गंवा बैठा । किन्तु दुर्भाग्य देखिये, भारत की अजय संतान पोरस पर उसकी विजय का वर्णन करते हुए वामपंथी थकते नही । असत्य का घोर इतिहास भारतीय इतिहास में इसलिए पैठ गया है, क्यो की जितने भी महान संघर्ष के इतिहास लिखे, यूनानियों ने ही लिखे । ओर यह तो सर्वज्ञात है कि घोर पराजयों से अपना मुँह काला करने वाले भी अपने पराभवो के विजय के आवरण में छद्म रूप से प्रस्तुत करते है । यही बात सिकन्दर के भारत के वीर हिन्दू पुरषों से भिड़ंत में हुई है । राम_पुरोहित
सिकंदर महान..... जैसा की पुकारा जाता है , ईशा पूर्व 356 में जन्मा था । वह मेसेडोनिया के राजा फिलिप द्वितीय ओर एपिरोड की शाहजादी ओलिम्पियस का पुत्र था । अपनी राजनीतिक बुद्धिमता के लिए फिलिप तो प्रख्यात था, किन्तु सिकन्दर की माता असंस्कृत, अशिक्षित, अशोभन , एक अभिचारिणी स्त्री थी ।
सिकन्दर जब 15 वर्ष का हो गया, तो उसकी शिक्षा दीक्षा के लिए प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक अरस्तू को नियुक्त किया गया । सिकंदर का अदम्य साहस और निरंकुश व्यवहार अरस्तू के दर्शन से वश में नही आया । सिकन्दर को लोगो को पीड़ा पहुंचाकर आनन्द आता था । एक बार जब उसका पिता राज्य की राजधानी में अनुपस्थित था, तो उसने सैनिक टुकड़ियां लेकर पहाड़ी क्षेत्रों के विद्रोह को दबाने के लिए उन ओर चढ़ाई कर दी ।
लगभग इसी समय उनके परिवार में पारिवारिक कलह चल रहा था, उन लोगो ने पृथक हो जाने का निर्णय किया । रानी ओलम्पियस राजमहल छोड़ के चली गयी, अपने उद्दंड स्वभाव के कारण सिकन्दर अपनी माँ के साथ ही गया । कुछ समय पश्चात फिलिप की हत्या कर दी गयी । इसमे सिकन्दर का हाथ था, इस बात से इनकार नही किया जा सकता । इसके बाद इसने अपने सौतेले भाई की भी हत्या करवा दी, ओर खुद राजा बन बैठा ।
साहसी तो यह था ही, धीरे धीरे इसने अपने राज्य का विस्तार करना प्रारम्भ किया । ईरान तक यह जीतते जीतते आ पहुंचा, जहां तहां इसने विजय प्राप्त की उस क्षेत्र में इसने आग लगवा दी, तहस - नहस कर दिया । ईरान आते ही इसे नोसेना भी मिल गयी । अब यह इतना शक्तिशाली हो गया, की खुद को ही सर्वशक्तिमान समझ बैठा , यहां तक कि खुद को ईश्वर का देवदूत समझ बैठा ।
ईरान में नोसेना मिली, इसके बाद इसने सीरिया को घेरा वहां विजय प्राप्त की । बाद में गाजा पर अधिकार कर यह मिस्र में जा घुसा , इधर ईरान ने खुद को दुबारा स्वतंत्र घोसित कर दिया । ज्यो ही इसने मेसोपोटामिया पर किया, ईरान की सेना इसके सामने आकर खड़ी हो गयी । भयंकर कालिक नरसंघार हुआ, ईरान की सेना दुबारा भाग खड़ी हुई ।
इसके बाद पहाड़ी क्षेत्रों को रौंदता हुआ सिकन्दर अफगानिस्तान आ पहुंचा । अब उसे अपनी जीतो पर घमंड होने लगा था । वह स्वम् को अर्धेस्वर समझने लगा था, ओर अपने को पूजन का अधिकारी समझ बिना ना नुकुर किये ही अप्रतिरोधिक समर्पण चाहता था ।
सिकंदर ने बसंत ऋतु के आस पास हिंदुकुश के पार पहुंचा । ओर सम्पूर्ण बैक्ट्रिया अपने अधीन कर लिया । किन्तु ज्यो ही उसकी सेना सिन्दू नदी के पार पहुंची, भारत के पठानों ( जो कि उस समय हिन्दू थे ) ने उनका जबरदस्त सामना किया । यह पठान उस समय भारत की बाह्य सीमा की रक्षा करते थे । लेकिन सिकंदर का यह पूर्ण सामना नही कर सके, ओर यह सिंधु नदी पार कर ही गया ।
इसमे इसकी सहायता भारत के प्रथम देशद्रोही " कुमार आंभी ने की । आंभी की राजधानी तक्षशिला हुआ करती थी । चेमार से लगते हुए पोरस का शाशन था, जो कश्मीर तक आकर खत्म होता था । राजा आंभी का पोरस से पुराना बैर था , अतः उसने सिकंदर को मदद कर पोरस से बदला लेने की पूरी पूरी चेष्ठा की । इसने सिकंदर को पूरा आश्वाशन दिया, की जब वो पोरस पर आक्रमण करेगा । पोरस अब अकेला पड़ गया था । जिसको सिकन्दर का सामना करना था । राजा आम्भी ने हर तरह से सिकन्दर की सहायता भी की ।
पारस्परिक वर्णनों में कोई तिथियां उपलब्ध नही है, किन्तु सिंधु नदी के ऊपर एक स्थायी पुल बना दिया गया, ओर सिकंदर की सेना भारत मे प्रवेश कर गयी । आक्रमकसेन ने अटक के उत्तर में 16 मिल पर पड़ाव डाला । सिकंदर के पास 20,000 पैदल ओर 25000 अश्व सेना थी । जो कि पोरस की सेना से कहीं अधिक सेना थी । सिकन्दर की सहायता आम्भी ओर ईरान के सेनिको ने भी की ।
महाराष्ट्रीय ज्ञानकोष के सप्तम भाग के पृष्ठ 539 पर लिखा है की सिकंदर ओर पोरस की सेनाओं के मध्य परस्पर संघर्ष चेनाब नदी के तट पर हुआ था । किन्तु क्रटिक्स लिखता है कि सिकन्दर झेलम नदी के दूसरी ओर पड़ाव डाले पड़ा था । पोरस के सैनिक उस द्वीप में तैरकर पहुंचे । उन लोगो ने उसपर यूनानी सेनिको पर घेरा डाल लिया, ओर अग्रिम दल पर हमला बोल दिया । उन्होंने अनेक यूनानी सेनिको को मार डाला । मृत्यु से बचने के लिए अनेक यूनानी सैनिक नदी में कूद पड़े, ओर वही डूब कर मर गए ।
ऐसा कहा जाता है कि सिकंदर ने झेलम नदी को एक घनी अंधेरी रात में नावों द्वारा हरनपुर से ऊपर 60 मिल की दूरी पर तेज कटाव के पास पर किया । पोरस के अग्रिम दल का नेतृत्व उसका पुत्र कर रहा था । भयंकर मुठभेड़ में वह मारा गया । कहा जाता है कि इन दिनों भयंकर वर्षा हो रही थी, ओर उसके हांथी दलदल में फंस गए । किन्तु यूनानी लेखकों द्वारा लिखे गए इतिहास को सूक्ष्म द्रष्टि से पढ़ा जाए, तो ज्ञात होता है पोरस की गजसेना ने भयंकर तबाही फैला दी थी । ओर सिकन्दर की शक्तिशाली फ़ौज को तहस नहस कर डाला था ।
एरियान लिखता है कि भारतीय युवराज ने सिकन्दर को घायल कर दिया था, ओर उसके घोड़े बुसे फेल्स को मार डाला ।
लेकिन जस्टिन नाम का एक इतिहासकार लिखता है कि जैसे ही युद्ध प्रारम्भ हुआ, पोरस ने भयंकर नाश का आदेश दे दिया ।।
अनावश्यक रक्त पात को रोकने के लिए पोरस ने उदारतावश ने केवल सिकंदर से अकेले ही निपट लेने का प्रस्ताव रखा । सिकंदर ने उस वीर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया । आगे जो हुआ , वह उसके मरने तक के आघात के नीचे ढेर हो गया । " धड़ाम" से युद्ध भूमि में नीचे गिर जाने से उसे शत्रुओं से घिर जाने का भय उतपन्न हुआ, किन्तु उसके अंगरक्षक किसी तरह उसे बचाकर ले गए ।
पोरस के हांथीयो द्वारा यूनानी सेनिको में उतपन्न आतंक का वर्णन करते कर्टिनेर लिखता है " इन पशुओं ने भयंकर आतंक उतपन्न कर दिया था , कर उनकी प्रतिध्वनि हिने वाली भीषण चीत्कार न केवल घोड़ो को भयातुर कर देती थी , जिससे बिगड़कर वे भाग खड़े होते थे, बल्कि घुड़सवारों के ह्रदय को भी दहला देती थी । इसने इनके वर्गों में ऐसी भगदड़ मचाई की विजयो के यह शिरोमणि अब ऐसे स्थान की खोज में लग गए, जहां उन्हें शरण मिल सके । अब चिड़चिड़े होकर सिकन्दर ने अपने सेनिको को यह आज्ञा दी कि जैसे भी इन हांथीयो पर प्रहार करें , ओर इसका परिणाम यह हुआ कि वे दुबारा पैरो तले रौंदे गए ।
सर्वादिक ह्रदय विदारक दृश्य तो वह था जब वह स्थूल चरम पर अपनी सूंड पर यूनानी सैनिक को पकड़ लेता था , ओर अपने ऊपर वायुमंडल में अधर हिलाता था । ओर उसको आरोही के पास पहुंचा देता था, जहां वह इसका सिर धड़ से अलग कर देता था । इस प्रकार ही सारा दिन व्यतीत होता रहा , ओर युद्ध चलता रहता ।
डियोडोरिस सत्यापन करता है " विशालकाय हाथियों में अपार बल था , ओर वे अत्यंत लाभकारी सिद्ध हुए , उन्होंने पैरो तले अनेक यूनानी सेनिको की हड्डी पसलियों का कचूमर बना दिया था । हाथी इन सेनिको को सूंड से पकड़ लेते, ओर जोर से भूमि पर पटक मारते, वे अपने विकराल गजदन्तो से यूनानी सेनिको को गोद - गोद कर मार डालते थे । "
झेलम के नजदीक सिकंदर की अधिकांश यूनानी सेना मारी गयी । सिकंदर ने अनुभव कर लिया, यदि में ओर लड़ाई जारी रखूंगा, तो अपना सम्पूर्ण नाश करवा बैठूंगा । अतः उसने युद्ध बन्द कर देने के लिए पोरस से प्रार्थना की । लेकिन पोरस ने सिकंदर को बंदी बनाकर कारगार में डाल दिया ।
कहा जाता है की सिकंदर की पत्नी ने पोरस को पत्र लिखा कि " पोरस उसे बहन समझ उसके सुहाग की रक्षा करे, ओर सिकंदर का वध ना करे। " एक हिन्दू अब कैसे उसका वध करता , यही हिन्दू की महानता होती है ।
सिकंदर ने युद्ध बन्द करने के लिए पोरस को कहा था कि " श्रीमान पोरस ! मुझे क्षमा कर दीजिए, मेने आपकी शूरता ओर सामर्थ्य शिरोधार कर ली है । अब इन कष्ठ को में ओर अधिक नही सह पाऊंगा । दुःखी ह्रदय हो अब में अपना जीवन समाप्त करने का इरादा कर चुका हूं । में नही चाहता कि मेरे सैनिक मेरे ही समान विनष्ट हो । में वह अपराधी हूँ, जिसने अपने ही सेनिको को कालके मुँह में धकेल दिया है । किसी राजा को यह शोभा नही देता की वह अपने सेनिको को इस प्रकार मृत्यु के मुख में धकेल दे । सिकंदर ने अपने कुछ राज्य भी पोरस को दे दिए ।
सिकंदर का सामर्थ्य प्राचीन भारत के हिन्दू वीरो के लोहे जैसे जिगर के आगे टकरा के चूर चूर हो चुका था । उसकी सेना ने आगे युद्ध करने से बिल्कुल साफ इंकार कर दिया था । उसकी पत्नी के निवेदन के कारण पोरस ने सिकंदर को रिहा कर दिया । किन्तु वापस लौटते समय पठानों को पोरस समझा नही सका । पठानों ने लौटते हुए सिकन्दर की सेना पर आक्रमण कर दिया, ओर सरपर भयंकर वार कर कर के सिकन्दर को भारत की भूमि में ही मार डाला ।
जब सिकंदर की सेना वापस लौटी, तो सिकंदर का शव लेकर ही लोटी ।
( नोट - चन्द्रगुप्त मौर्य का सिकन्दर से कोई लेना देना नही था । इनके काल मे ही कम से कम 1000 सालो के ऊपर का फर्क है )